सरी ब्यबस्था गाँव कै, लीन्हे ही बइठान।
ओखे ऊपर टेक्स का ,आबा है फरमान।।
आबा है फरमान बचै न कउनव जनता।
चाह मड़इया बखरी हो या कोलिया खन्ता।।
हंस कहिन अब उनहूँ का तो पलटी तकथा।
लाद रहें जे टेक्स गाँव के सरी ब्यबस्था। ।
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
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