मेरी पसंद
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रात रात भर जाग के कागद रगे हजार।
पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।
महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद
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रात रात भर जाग के कागद रगे हजार।
पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।
महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
छन्द
सरग से नीक मोरे देस कै य धरती ही,
जिव से है अधिक पियार बंदेमातरं।
ताजमहल से ही स्वारा आना सुंदर य,
आपन माटी देश कै सिंगार बंदेमातरं॥
बहै नदी कलकल पानी करै छलछल,
टेराथें पहार औ कछार बंदेमातरं।।
जहां बीर बलिदानी भारत का बचामै पानी,
बलिदान होइगें पुकार बंदेमातरं॥
दोहा
बंदेमातरम मा भरा, देस राग का कोस।
आंखर आंखर मा हबै, देसभक्ति का जोस।।
उनही सौ सौ नमन जे किन्हिन जीबन हूम।
बंदेमातरम बोल के, गें फांसी मा झूम।।
बन्देमातरम गाइ के, देस लिहिस एक मोड़।
भिन्न भिन्न मत का दिहिस, एक मन्त्र मा जोड़।।
आबा सब जन पुन करी, नेम प्रेम कै बात।
भारत के दुसमन हमैं, नफरत के उत्पात ।।
हेमराज हंस - भेंड़ा मैहर
सम्पर्क - 9575287490
जहाँ बघेली आय के, होइगै अगम दहार।
काकू जी के बोल का,नमन है बारम्बार।।
शम्भू काकू ता अहीं, रिमहाई के सिंध।
देह धरे गाबत रहा,मानो कबिता बिंध।।
गाँउ गली चउपाल तक, जेखर बानी गूँज।
काकू जी ता भें अमर,ग्राम गिरा का पूज।।
लिहे घोटनी चलि परैं,जब कबिता के संत।
कविजन काकू का कहैं, रिमही केर महंत।।
जेखे कबिता के बिषय, आँसू आह कराह।
अच्छर फरयादी बने, काकू खुदइ गबाह।।
आखर आखर मा बसय,काकू कै कहनूत।
हंस बंदना कइ रहा, धन्न बघेली पूत।।
हेमराज हंस भेड़ा
उनसे छरकाहिल रहैं, तुक्क बाज बदमास।।
सादर ही सुभकामना, जनम दिना कै मोर।
रिमही मा हें सरस जी , जस पाबस का मोर।।
हेमराज हंस
सुमर कै नजर नित रहा थी बिष्ठा मा।
हमीं कउनव सक नहीं ओखे निष्ठा मा।।
सेंतय का झारन मा जरा बरा जात है
गदहा परेशान है गईया के प्रतिष्ठा मा।।
हेमराज हंस
राहू अमरित पी लिहिस, जनता ओसे हीच।
अइसै हेमय समाज मा, उच्च कोटि के नीच।।
कहिन भुसुण्डी सुन गरूड़, तजै सुभाव न नीच।
गंग नहा ले सुमर चह ,तउ पुन लोटय कीच।।
हेमराज हंस
श्री हरि कुशवाह ,हरि ,
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