जहाँ बघेली आय के, होइगै अगम दहार।
काकू जी के बोल का,नमन है बारम्बार।।
शम्भू काकू ता अहीं, रिमहाई के सिंध।
देह धरे गाबत रहा,मानो कबिता बिंध।।
गाँउ गली चउपाल तक, जेखर बानी गूँज।
काकू जी ता भें अमर,ग्राम गिरा का पूज।।
लिहे घोटनी चलि परैं,जब कबिता के संत।
कविजन काकू का कहैं, रिमही केर महंत।।
जेखे कबिता के बिषय, आँसू आह कराह।
अच्छर फरयादी बने, काकू खुदइ गबाह।।
आखर आखर मा बसय,काकू कै कहनूत।
हंस बंदना कइ रहा, धन्न बघेली पूत।।
हेमराज हंस भेड़ा