श्री शिवशंकर सरस जी, बोली के चउमास।
उनसे छरकाहिल रहैं, तुक्क बाज बदमास।।
सादर ही सुभकामना, जनम दिना कै मोर।
रिमही मा हें सरस जी , जस पाबस का मोर।।
हेमराज हंस
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
उनसे छरकाहिल रहैं, तुक्क बाज बदमास।।
सादर ही सुभकामना, जनम दिना कै मोर।
रिमही मा हें सरस जी , जस पाबस का मोर।।
हेमराज हंस
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर