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गुरुवार, 28 मार्च 2024

महल मड़इया से रंगदारी भूल गा।

 महल मड़इया से रंगदारी भूल गा। 

जउन दइस रहा वा उधारी भूल गा।। 

जब से चुनाव कै घोसना भै देस मा 

तब से मुँह झुरान है गारी  भूल गा।।  

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मेरी पसंद

मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर