चल रही गाड़ी राम भरोसे।
ढ़ड़क रही ही ढोसे ढोसे। ।
उइ भाईचारा कै बात करा थें
चक्कू लये औ कट्टा खोसे। ।
तुहूँ खूब फरगाय लिहा
पसगइयत थर्रा थै ओसे।।
पहँसुल मा काटा थें सुपारी
सनकी मारै सरउंता मोसे।
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
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