मदारी रोबा थें बांदर रोबा थें।
परिबार बिलखत है बिरादर रोबा थें।।
बंगाल मा ! हा हा कार मचा है
उइ 356 धरे आँधर सोबा थें। ।
हेमराज हंस
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
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