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रविवार, 25 अक्टूबर 2015

हमने गद्दारों की ऐसी नसल देखी है।

हमने गद्दारों की ऐसी नसल देखी  है। 
जो खेत खा जाय ऐसी फसल देखी है। ।

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मेरी पसंद

मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर