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मंगलवार, 5 जनवरी 2016

दोस्ती के नाम पे ग़द्दारी की है। ।

जब जब हमने यारी की है। 
तो  उसने मक्कारी की है। । 
चाहे हो कारगिल य पठानकोट 
दोस्ती के नाम पे ग़द्दारी की है। । 
हेमराज हँस

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मेरी पसंद

मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर