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गुरुवार, 22 जनवरी 2026

MAHA KAVI SAMMELAN SATNA 22.01.2026


मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद मध्य प्रदेश शासन द्वारा सतना में एक दिवसीय बघेली साहित्य संगम का भव्य आयोजन किया गया।अकादमी के निदेशक माननीय श्री विकास दवे जी के मार्गदर्शन एवं श्री राकेश सिंह,श्री चंद्रकांत तिवारी,डाॅ. रामानुज पाठक एवं श्री अनिल अयान के संयोजन में बघेली भाषा एवं साहित्य के विविध पक्षों पर व्यापक विमर्श किया गया,जिसमें बघेली बोली के संरक्षण एवं उन्नति हेतु अनेक सुझाव भी वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत किए गए। जिसमें विशेष रूप से बघेली में गद्य साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन की आवश्यकता एवं घर परिवार में बघेली बोली में संवाद को प्रमुखता से उठाया गया। बघेली साहित्य संगम में अनेक वक्ताओं ने अपनी विचार रखे,जिनमें प्रमुख रूप से डॉ. चंद्रिका प्रसाद चंद्र,श्री जयराम शुक्ल,डॉ राम गरीब पाण्डेय विकल, श्री सत्येंद्र सिंह सेंगर,डॉ.रामसरोज द्विवेदी शांतिदूत,श्री विभू सूरी, डाॅ.रंजना मिश्रा,श्री कनिष्क तिवारी,श्री भृगुनाथ पाण्डेय भ्रमर,डॉ. राजकुमार शर्मा राज 
 

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

श्री शिवशंकर सरस जी


 श्री शिवशंकर सरस जी, बोली के चउमास। 

उनसे छरकाहिल रहैं, तुक्क बाज बदमास।। 

सादर ही सुभकामना, जनम दिना कै मोर। 

रिमही मा हें सरस जी , जस पाबस का मोर।।  

हेमराज हंस 

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

गदहा परेशान है गईया के प्रतिष्ठा मा।।

 सुमर कै नजर नित  रहा   थी  बिष्ठा  मा। 

हमीं  कउनव सक नहीं ओखे निष्ठा मा।।  

सेंतय का  झारन  मा जरा  बरा जात  है 

गदहा  परेशान है  गईया  के प्रतिष्ठा मा।।   

हेमराज हंस 

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

उच्च कोटि के नीच

 

राहू अमरित पी  लिहिस, जनता ओसे हीच। 

अइसै हेमय समाज मा, उच्च कोटि के नीच।। 


कहिन भुसुण्डी सुन गरूड़, तजै सुभाव न नीच।

गंग नहा ले सुमर चह ,तउ पुन लोटय कीच।।

हेमराज हंस  

धरम ध्वजा फहरी


धरम ध्वजा फहरी अबध, भारत गउरव पर्ब । 

मानो  सीना   तान  के,  करय  सनातन  गर्व।।    

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

श्री हरि कुशवाह ,हरि ,

 श्री हरि कुशवाह ,हरि ,

मैहर के कवियों में कुशवाह हरि एक जाना पहचाना नाम है। जो चाहे हिंदी में अपने गीत य ग़ज़ल लिखे य बघेली में पर जो भी लिखा वह ठोक बजाकर । इसीलिए शायद किसी ने कभी उनके बारे में कहा रहा होगा कि,
जेमा न नंचिउ खोट त ओही खरी कहा थे,
गइल चलत मिल जाय त ओही डरी कहा थे।
बइठ मंच पुटपार्थी के साईं बाबा कस,
मइहर के मनई सब उनही हरी कहा थे।।
पेशे से नगरपालिका के बरिष्ठ लेखापाल पद से रिटायर श्री कुशवाह ,हरि , का एक बघेली काब्य संकलन भी प्रकाशित है।
आइये पहले उनके गजल से ही शुरुआत करते है।
मन मा उचय सबाल त कइसा करी फलाने,
कउनों सुनय न हाल त कइसा करी फलाने।
पनही मिली उन्ही ता बारी क रउद डारिन,
उनकर बढ़ी मजाल त कइसन करी फलाने।।
नउपर के तुपक दारी मूड़े म धरे गोरसी,
झूरय बजामै गाल त कइसन करी फलाने।
नङ्गा नहाय तउनव निचोमय के फिकिर मा,
बनिया बने कंगाल त कइसा करी फलाने।।
आपन न टेट देखय आने कै फूली झाकय,
दुनिया क यहै हाल त कइसा करी फलाने।
भूभुर करय क पोहगर खुरखुंद त कइ डारिन,
मुखियय बने दलाल त कइसा करी फलाने।।
केतनेव क खाय डारिस या तन्चबूदी रोटी,
पेटय बना बबाल त कइसन करी फलाने।
हाथी निकर ग सगला बस रहिगे पूछ् बाक़ी,
अब गामै उय बेताल त कइसन करी फलाने।।
चलनी म दूध दुहि के रोमय लिलार काही,
बिगड़ी है उनकर चाल त कइसन करी फलाने।
नव सौ गटक के मुसबा हज का चली बिलारी,
अधरौ लिहे मसाल त कइसन करी फलाने ।।
चाकी परी य देश मा लूडा लगाय दीहिंन ,
सइया बने कोतवाल त कइसन करी फलाने।
कइसन कही कि रानी बइठी चुनू सम्हर के,
राजा करी हलाल त कइसा करी फलाने।।
निबले कै तो मेहरिया सब कै लगा थी भउजी,
बुढऊ जो ठोकै ताल त कइसा करी फलाने।
लिलरी न जियत माछी हमसे सुना हरी तुम,
रहिगा यहै मलाल त कइसा करी फ़लाने।।
यह तो रही श्री हरि कुशवाह की ग़ज़ल अब उनके एक गीत का भी जायका लीजिये।सकबन्धे म प्रान फलाने बलम सोचय म झुखाने।
कोरे कागद अउठा दीहिंन ,
बंधुआ बन के करजा लींहिंन।
ब्याज बरे हमहू से बेउहर बहुत बेर फुहराने,
बलम सोचय मा झुखाने ।।
जब थाने मा रपट लिखामै,
उलटे उनही दपट भगामै।
हमही निबल कै जान मेहरिया रोज बोलामय थाने,
बलम सोचय म झुखाने।।
पेट पेंटागन जेठ दुपहरी,
बागा थे फिफियाँन कचेहरी।
खेती बारी कुरकी होइगे दूनव बैल बिकने,
बलम सोचय मा झुखाने।
हमरे बिधायक रसिया बड़े है,
जब देखय खटिया म पडे है।
उनही घर से दूरी राखय कउनों न कउनों बहाने,
बलम सोचय मा झुखाने।
इस तरह श्री हरि कुशवाह , हरि, अपने क्षेत्रीय मुहाबरे लोकोक्तियों और प्रतीकों को अपने कविताओ में सजोते हुए अनेक गीत और ग़जल लिखे है।

मंगलवार, 4 नवंबर 2025

तुम बत्तीसी काढ़ दिहा

तुम बत्तीसी  काढ़  दिहा औ खीस निपोरे चले गया। 
गील पिसान हमार देख परथन का बटोरे चले गया।। 


सिसकत राति से पूछि लिहा कस लाग पलेबा खेते मा 
तुम बिदुरात साँझ देखय का बड़े अँजोरे चले गया।। 


 गाय बिआन ता बनी पेंउसरी  पै पेटपोछना  नहीं  रहा 
पूरा दिन महतारी रोयी  तुम बिन मुँह फोरे चले गया।। 


जब से रोमा झारिस नफरत प्रेम का रकबा घटा खूब 
खसरा  माही  दर्ज  खैरिअत  झूंटय  झोरे चले गया।। 


काल्ह  फलनिया  कहत  रही या सरबार मा  गाज गिरै 
कउनव  साध न पूर भयीं , बस गउखर जोरे चले गया।।


चित्रकूट मा दीपदान का खासा जबर  जलसा भा हंस 
पै तोहार नजर  गदहा  हेरैं  ता उनखे  ओरे चले  गया।। 
हेमराज हंस - 

सीताफल पहिले कटहर रहा

 बघेली कविता 

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उइ कहा थें सीताफल पहिले कटहर रहा। 

ओखा  खांय   मा   बड़ा   अटहर     रहा।।

अब खिआत खिआत  होइगा चुनू बूदा। 

यतना सुनतै  एक बांदर डाल से कूदा।। 

कहिस काहे लबरी बतात्या है 

हमीं लगा थी गिल्लिआन । 

हम मनई बनै का 

घिस रहे हन आपन 

पूंछ पै आजु तक नहीं खिआन।।

अब हम डारबिन से मिलय का 

बनबाय रहे हन  बीजा। 

फुरा जमोखी करामैं का 

साथै लइ जाब एक ठे

 दुरजन   भतीजा। 

कहब की पच्छिम कै  बात 

पूरब माँ लागू  नहीं होय। 

आजा का जनम  नाती के

 आगू नहीं होय।।  

मनई कबहूँ नहीं रहा बांदर। 

हाँ जबसे हम श्री राम जू के 

सेना मा भर्ती भयन 

तब से समाज मा  खूब हबै आदर।  

तब से हमूं गदगद हयन मन मा। 

चित्रकूट अजोध्या औ  देखा 

बृंदाबन मा। 

✍️हेमराज हंस 

केत्ते अपराधी निता

 पूछ रही ही दलन से, दरबारन कै ईंट।

केत्ते अपराधी निता, ही आरक्षित सीट।।

सोमवार, 3 नवंबर 2025

हम उनही दिल दइ दीन्ह्यान

 हम उनही दिल दइ दीन्ह्यान अब गुर्दा माँगा थें। 

बारिस  मा  सब सरि गै धान  ता  उर्दा माँगा थें।।

स्वस्थ बिभाग के सेबा से गदगद हें सब रोग बिथा 

अस्पताल   से   हरबी    छुटटी    मुर्दा माँगा थें।। 

हेमराज हंस 

रविवार, 2 नवंबर 2025

विश्व विजेता बन गयीं


 विश्व विजेता बन गयीं, रच दीन्हिन इतिहास। 

भारत काही गर्ब  है, बाह बिटिअव सब्बास ।। 

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

कामिल बुल्के राम-कथा

 लेखक रेबरेंड फ्रादर कामिल बुल्के, एस० जे०, एम० ए०, डो० फ़िल० अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, सत जेवियर कॉलिज, राँची

१६६२ हिन्दी परिषद्‌ प्रकाझन प्रयाग विश्वविद्यालय 


थहाँ रामायण की आधिकारिक कथावस्तु से सीधा सबंध रखने बाले पात्रों का अभिप्राय है। विश्वामित्र, अगरूय, बसिष्ठ और भरद्वाज ऋग्वेद के ऋषि हैं, बाऊकाड और उत्तरकांड की विविध अंतरकथाओं के ” यात्रों के नाम वदिक साहित्य में मिलते है । उनका यहाँ पर उल्लेख नहीं होगा ।

TULSIDAS----- EK PAHELI

विद्यापति के समय अर्थात् पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वाद में ही हिन्दी में नाटक लिखने की प्रथा का सूत्रपात हुआ था। तब से लगभग दो सौ वर्ष पर्यन्त इस विषय में कई कारणों से कुछ भी न हो पाया । सत्रहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध में नेवाज कवि ने पहले पहल महा- कवि कालिदास के संस्कृत शकुन्तला नाटक के आधार पर 'शकुन्तला- उपासवान' लिखा जो उन दिनों को दृष्टि से अब तक नाटक के नाम से पुकारा जाता है। इस पुस्तक में और आजकल के लिखे हिन्दी नाटकों में बड़ा अन्तर है। परन्तु विद्यापति के नाटको से इसमें यह विशेषता है कि इसमें बिहारी नाटकों के समान मैथिली और संस्कृत की खिचड़ी देखने को नहीं मिलती। पूरी पुस्तक लगभग एक ही भाषा में है। एक बात स्मरण रखने योग्य है कि उर्दू साहित्य में भी नाटक का आरम्भ किसी हिन्दू द्वारा किये गए शकुन्तला के अनुवाद से ही फर्रुखरियर के समय में होता है। अठारहवीं शताब्दी के हिन्दी नाटककार, नाट्यकला की दृष्टि से, नेबाज से अधिक कुछ भी नहीं कर पाये देव तथा ब्रजवासी दास आदि के नाटक इस विषय में शकुन्तला - उपाख्यान से अच्छे नहीं कहे जा सकते । इन उपयुक्त नाटकों में न तो आधुनिक नाटकों के से टीक-टीक विभाग किये गए हैं और न स्थाना- नुसार पात्रों के आने-जाने अथवा और किसी प्रकार के नाट्य करने के संकेत ही दिये गए हैं। यह सभी वास्तव में कोरे काव्य के काव्य हैं। ऐसे ही नाटक उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वाद तक देखने को मिलते हैं। सन् १८५० के लगभग लिखे गए बिहारी कवि भानुनाथ झा के 'प्रभावती हरण' नामक नाटक में कुछ विशेषता अवश्य है, किन्तु वह भी बहुत थोड़ी । महाराजा विश्वनाथ सिंह के 'आनन्द रघुनन्दन नाटक की भी यही दशा है। आधुनिक हिन्दी नाटक लिखने का आरम्भ भारतेन्दु बाबु हरि- श्चन्द्र के अनुसार उनके पिता बाबू गोपालचन्द्र द्वारा लिखे हुए 'नहुप नाटक से होता है। यह पुस्तक सन् १८५७ के लगभग लिखी गई थी, किन्तु अब तक इसे पढ़ने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को प्राप्त हुआ होगा। इन्हीं बाबू साहब ने सर्व प्रथम हिन्दी में नियमानुसार महाकाव्य की रचना की थी। परन्तु इनका 'जरासन्ध-वध' महाकाव्य भी 'नहुप' नाटक के ही समान अभी तक देखने को नहीं मिला । उर्दू साहित्य में अच्छे नाटकों का श्रारम्भ इससे २० वर्ष बाद अर्थात् १८७७ से होता है और तभी से उर्दू नाटककार लगातार थोड़ी-बहुत उन्नति करते चले आ रहे हैं। हिन्दी साहित्य के नाटक विभाग के लिए ये दिन बहुत ही अच्छे थे। इसके कुछ ही दिनों के उपरान्त राजा लक्ष्मण सिंह, लाला श्री निवासी दास, पं.० केशवराय भट्ट, बाबू तोताराम, आदि ने कई नाटक लिखे । किन्तु इनमें से अधिकतर इतने बड़े-बड़े बन गए कि उनको आजकल, विना काँट छाँट किये खेलना असम्भव सा हो गया है। बदरीनारायण चौधरी का 'भारत-सौभाग्य' नाटक इसका सबसे बड़ा उदाहरण कहा जा सकता है। इस समय के नाटकों में सबसे अच्छे भारतेन्दु बाबूहरिश्चन्द्र के ही नाटक कहे जा सकते हैं। किन्तु इनके १८ वा १६ नाटकों में से सबके लिए ऐसा कहना भी भारी भूल है। इनके द्वारा अनुवादित नाटक विशेषकर अच्छे हैं। कभी-कभी तो उनमें मौलिक नाटक का भ्रम हो जाया करता है। इन सबके संब नाटकों में यह एक विशेषता है कि इन्हें किसी प्रकार रंगमंच पर खेल सकते हैं और भारतेन्दु-युग में रखें हुए नाटकों से इसी कारण, एक नये युग का आरम्भ होता है। इनके द्वारा अनुवादित तथा नये सिरे 0 से लिखित कुछ नाटकों में इतनी सफलता मिली कि बहुत से लोगों ने इन्हीं का अनुकरण करके नाटकों का लिखना आरम्भ कर दिया । संस्कृत, प्राकृत तथा अंग्रेजी नाटको का अनुवाद होने लगा। कभी नये, कभी सामाजिक, पौराणिक अथवा अत्यान्य प्रकार के नाटक मंच पर खेलने के उद्देश्य से लिखे जाने लगे । सबसे पहले सन १८६८ में 'जानकी मंगल' नामक हिन्दी नाटक काणी में खेला गया था । तब से यदि उचित परिश्रम हुआ होता और लोगों की रुचि इस ओर सफलता पूर्वक खिंची होती, तो आज तक हमारे नाटक सम्भव था, किसी भी दूसरी भाषा के नाटकों से कभी पिछड़ नहीं जाते । परन्तु ऐसा न हो सका और थोड़े ही दिनों के अनन्तर, फिर पुरानी प्रथा लोट आई। उधर मराठी, गुजराती तथा उर्दू और बंगला के नाटको के खेलने के लिए नाटक मण्डलियाँ वन कर तैयार हुई और इधर हिन्दी के कितने ही लब्ध प्रतिष्ट कविवर अपना बहुमूल्य समय पुरानी डफली पीटने में ही नष्ट करते रहे । संस्कृत नाटकों के अनुवाद तो वैसे थे ही, नये-नये पौराणिक नाटक तक अभी इस ढंग से लिखे जाते है जिन्हें दृश्य काव्य कहना मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं, इन्हें श्रव्य अथवा पाठ्य काव्य कहना कदाचित् अधिक उपयुक्त होगा। अन्य भारतीय भाषाओं के नाटकों की तुलना के लिए हिन्दी में अभी कुछ ही दिन पहले तक आधे दर्जन से अधिक नाटक नहीं निकल सकते थे ।  

मेरी पसंद

मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर