बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
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गुरुवार, 22 जनवरी 2026
MAHA KAVI SAMMELAN SATNA 22.01.2026
सोमवार, 29 दिसंबर 2025
बुधवार, 10 दिसंबर 2025
श्री शिवशंकर सरस जी
श्री शिवशंकर सरस जी, बोली के चउमास।
उनसे छरकाहिल रहैं, तुक्क बाज बदमास।।
सादर ही सुभकामना, जनम दिना कै मोर।
रिमही मा हें सरस जी , जस पाबस का मोर।।
हेमराज हंस
गुरुवार, 27 नवंबर 2025
गदहा परेशान है गईया के प्रतिष्ठा मा।।
सुमर कै नजर नित रहा थी बिष्ठा मा।
हमीं कउनव सक नहीं ओखे निष्ठा मा।।
सेंतय का झारन मा जरा बरा जात है
गदहा परेशान है गईया के प्रतिष्ठा मा।।
हेमराज हंस
मंगलवार, 25 नवंबर 2025
उच्च कोटि के नीच
राहू अमरित पी लिहिस, जनता ओसे हीच।
अइसै हेमय समाज मा, उच्च कोटि के नीच।।
कहिन भुसुण्डी सुन गरूड़, तजै सुभाव न नीच।
गंग नहा ले सुमर चह ,तउ पुन लोटय कीच।।
हेमराज हंस
शुक्रवार, 14 नवंबर 2025
श्री हरि कुशवाह ,हरि ,
श्री हरि कुशवाह ,हरि ,
गुरुवार, 6 नवंबर 2025
मंगलवार, 4 नवंबर 2025
तुम बत्तीसी काढ़ दिहा
सीताफल पहिले कटहर रहा
बघेली कविता
===============
उइ कहा थें सीताफल पहिले कटहर रहा।
ओखा खांय मा बड़ा अटहर रहा।।
अब खिआत खिआत होइगा चुनू बूदा।
यतना सुनतै एक बांदर डाल से कूदा।।
कहिस काहे लबरी बतात्या है
हमीं लगा थी गिल्लिआन ।
हम मनई बनै का
घिस रहे हन आपन
पूंछ पै आजु तक नहीं खिआन।।
अब हम डारबिन से मिलय का
बनबाय रहे हन बीजा।
फुरा जमोखी करामैं का
साथै लइ जाब एक ठे
दुरजन भतीजा।
कहब की पच्छिम कै बात
पूरब माँ लागू नहीं होय।
आजा का जनम नाती के
आगू नहीं होय।।
मनई कबहूँ नहीं रहा बांदर।
हाँ जबसे हम श्री राम जू के
सेना मा भर्ती भयन
तब से समाज मा खूब हबै आदर।
तब से हमूं गदगद हयन मन मा।
चित्रकूट अजोध्या औ देखा
बृंदाबन मा।
✍️हेमराज हंस
सोमवार, 3 नवंबर 2025
हम उनही दिल दइ दीन्ह्यान
हम उनही दिल दइ दीन्ह्यान अब गुर्दा माँगा थें।
बारिस मा सब सरि गै धान ता उर्दा माँगा थें।।
स्वस्थ बिभाग के सेबा से गदगद हें सब रोग बिथा
अस्पताल से हरबी छुटटी मुर्दा माँगा थें।।
हेमराज हंस
रविवार, 2 नवंबर 2025
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025
कामिल बुल्के राम-कथा
लेखक रेबरेंड फ्रादर कामिल बुल्के, एस० जे०, एम० ए०, डो० फ़िल० अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, सत जेवियर कॉलिज, राँची
थहाँ रामायण की आधिकारिक कथावस्तु से सीधा सबंध रखने बाले पात्रों का अभिप्राय है। विश्वामित्र, अगरूय, बसिष्ठ और भरद्वाज ऋग्वेद के ऋषि हैं, बाऊकाड और उत्तरकांड की विविध अंतरकथाओं के ” यात्रों के नाम वदिक साहित्य में मिलते है । उनका यहाँ पर उल्लेख नहीं होगा ।
TULSIDAS----- EK PAHELI
विद्यापति के समय अर्थात् पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वाद में ही हिन्दी में नाटक लिखने की प्रथा का सूत्रपात हुआ था। तब से लगभग दो सौ वर्ष पर्यन्त इस विषय में कई कारणों से कुछ भी न हो पाया । सत्रहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध में नेवाज कवि ने पहले पहल महा- कवि कालिदास के संस्कृत शकुन्तला नाटक के आधार पर 'शकुन्तला- उपासवान' लिखा जो उन दिनों को दृष्टि से अब तक नाटक के नाम से पुकारा जाता है। इस पुस्तक में और आजकल के लिखे हिन्दी नाटकों में बड़ा अन्तर है। परन्तु विद्यापति के नाटको से इसमें यह विशेषता है कि इसमें बिहारी नाटकों के समान मैथिली और संस्कृत की खिचड़ी देखने को नहीं मिलती। पूरी पुस्तक लगभग एक ही भाषा में है। एक बात स्मरण रखने योग्य है कि उर्दू साहित्य में भी नाटक का आरम्भ किसी हिन्दू द्वारा किये गए शकुन्तला के अनुवाद से ही फर्रुखरियर के समय में होता है। अठारहवीं शताब्दी के हिन्दी नाटककार, नाट्यकला की दृष्टि से, नेबाज से अधिक कुछ भी नहीं कर पाये देव तथा ब्रजवासी दास आदि के नाटक इस विषय में शकुन्तला - उपाख्यान से अच्छे नहीं कहे जा सकते । इन उपयुक्त नाटकों में न तो आधुनिक नाटकों के से टीक-टीक विभाग किये गए हैं और न स्थाना- नुसार पात्रों के आने-जाने अथवा और किसी प्रकार के नाट्य करने के संकेत ही दिये गए हैं। यह सभी वास्तव में कोरे काव्य के काव्य हैं। ऐसे ही नाटक उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वाद तक देखने को मिलते हैं। सन् १८५० के लगभग लिखे गए बिहारी कवि भानुनाथ झा के 'प्रभावती हरण' नामक नाटक में कुछ विशेषता अवश्य है, किन्तु वह भी बहुत थोड़ी । महाराजा विश्वनाथ सिंह के 'आनन्द रघुनन्दन नाटक की भी यही दशा है। आधुनिक हिन्दी नाटक लिखने का आरम्भ भारतेन्दु बाबु हरि- श्चन्द्र के अनुसार उनके पिता बाबू गोपालचन्द्र द्वारा लिखे हुए 'नहुप नाटक से होता है। यह पुस्तक सन् १८५७ के लगभग लिखी गई थी, किन्तु अब तक इसे पढ़ने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को प्राप्त हुआ होगा। इन्हीं बाबू साहब ने सर्व प्रथम हिन्दी में नियमानुसार महाकाव्य की रचना की थी। परन्तु इनका 'जरासन्ध-वध' महाकाव्य भी 'नहुप' नाटक के ही समान अभी तक देखने को नहीं मिला । उर्दू साहित्य में अच्छे नाटकों का श्रारम्भ इससे २० वर्ष बाद अर्थात् १८७७ से होता है और तभी से उर्दू नाटककार लगातार थोड़ी-बहुत उन्नति करते चले आ रहे हैं। हिन्दी साहित्य के नाटक विभाग के लिए ये दिन बहुत ही अच्छे थे। इसके कुछ ही दिनों के उपरान्त राजा लक्ष्मण सिंह, लाला श्री निवासी दास, पं.० केशवराय भट्ट, बाबू तोताराम, आदि ने कई नाटक लिखे । किन्तु इनमें से अधिकतर इतने बड़े-बड़े बन गए कि उनको आजकल, विना काँट छाँट किये खेलना असम्भव सा हो गया है। बदरीनारायण चौधरी का 'भारत-सौभाग्य' नाटक इसका सबसे बड़ा उदाहरण कहा जा सकता है। इस समय के नाटकों में सबसे अच्छे भारतेन्दु बाबूहरिश्चन्द्र के ही नाटक कहे जा सकते हैं। किन्तु इनके १८ वा १६ नाटकों में से सबके लिए ऐसा कहना भी भारी भूल है। इनके द्वारा अनुवादित नाटक विशेषकर अच्छे हैं। कभी-कभी तो उनमें मौलिक नाटक का भ्रम हो जाया करता है। इन सबके संब नाटकों में यह एक विशेषता है कि इन्हें किसी प्रकार रंगमंच पर खेल सकते हैं और भारतेन्दु-युग में रखें हुए नाटकों से इसी कारण, एक नये युग का आरम्भ होता है। इनके द्वारा अनुवादित तथा नये सिरे 0 से लिखित कुछ नाटकों में इतनी सफलता मिली कि बहुत से लोगों ने इन्हीं का अनुकरण करके नाटकों का लिखना आरम्भ कर दिया । संस्कृत, प्राकृत तथा अंग्रेजी नाटको का अनुवाद होने लगा। कभी नये, कभी सामाजिक, पौराणिक अथवा अत्यान्य प्रकार के नाटक मंच पर खेलने के उद्देश्य से लिखे जाने लगे । सबसे पहले सन १८६८ में 'जानकी मंगल' नामक हिन्दी नाटक काणी में खेला गया था । तब से यदि उचित परिश्रम हुआ होता और लोगों की रुचि इस ओर सफलता पूर्वक खिंची होती, तो आज तक हमारे नाटक सम्भव था, किसी भी दूसरी भाषा के नाटकों से कभी पिछड़ नहीं जाते । परन्तु ऐसा न हो सका और थोड़े ही दिनों के अनन्तर, फिर पुरानी प्रथा लोट आई। उधर मराठी, गुजराती तथा उर्दू और बंगला के नाटको के खेलने के लिए नाटक मण्डलियाँ वन कर तैयार हुई और इधर हिन्दी के कितने ही लब्ध प्रतिष्ट कविवर अपना बहुमूल्य समय पुरानी डफली पीटने में ही नष्ट करते रहे । संस्कृत नाटकों के अनुवाद तो वैसे थे ही, नये-नये पौराणिक नाटक तक अभी इस ढंग से लिखे जाते है जिन्हें दृश्य काव्य कहना मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं, इन्हें श्रव्य अथवा पाठ्य काव्य कहना कदाचित् अधिक उपयुक्त होगा। अन्य भारतीय भाषाओं के नाटकों की तुलना के लिए हिन्दी में अभी कुछ ही दिन पहले तक आधे दर्जन से अधिक नाटक नहीं निकल सकते थे ।
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मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर






