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मंगलवार, 3 नवंबर 2015

अब को माजी चाह का गंजा जानी थे। ।

हम सब उनखर छक्का पंजा जानी थे। 
अब को माजी चाह का गंजा जानी थे। । 
जब उनखे मूड़े बीत ता हम बिदुरात रहयन 
अब हमरे घुटकी कसी शिकंजा जानी थे। । 
हेमराज हंस

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मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर