भाई अस दूसर नही जो भउजाई बांख न होय।
बाउर अस है वा समाज जेखर आपन भाख न होय। ।
देस कै जनता नेम प्रेम भाई चारा से रहि तो लेय
जो हमरे देस मा नफरत कै कारी अँधिआरी पाख न होय। ।बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
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