चुप रह दादु
उनखे कइती चका चक्क औ हमरे कई अमौसा है।
द्ग द्ग देह फलाने कै हमरे तन मा खौसा है। ।
उई गमला कै हरियरी देख खेती कै गणित लगाउथें
चौबे जी कहिन चुप रहु दादु भाउसा है। ।
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
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