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गुरुवार, 1 जनवरी 2015

गोबर से कण्डा बनय औ गोबरय से गौर।
आपन आपन मान है अपने अपने ठौर। 

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मेरी पसंद

मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर