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सोमवार, 26 जनवरी 2015

बघेली कविता

बघेली कविता htpp;//baghelihemraj.blogspotbagheli sahitya

हमरे   घर   के    आगी   का
 बदला नाव बैसुन्दर होइगा। 
जे आने   का   हड़पिस  हीसा
 ओही आज भगन्दर होइगा। । 
लोभ दिहिन उई   बन के बदरी
 फसल जमी ता निचंदर होइगा। । 
बन गा   सोने   का   मृग मामा
 औ साधू   दसकंधर  होइगा। । 
पुन  के  छली   जई  अब वृंदा
 आतताई   जलंधर  होइगा। । 
चुहकै   लगे  ख़ून  जनता  का
 उनखर पेट सिकंदर होइगा। । 
जहा समाती है सब नदिया 
वाखर नाव समन्दर  होइगा 
                                        


हेमराज त्रिपाठी 

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मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर