बघेली मुक्तक
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हम जानिथे अपना कै मजबूरी ही।
धंधा करय का है ता राजनीत जरुरी ही। ।
सत्तर साल होइगे देस का आज़ाद भये
गाँव तरसै पानी का अपना के मुँह मा अंगूरी ही। ।
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
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