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बुधवार, 10 दिसंबर 2025

श्री शिवशंकर सरस जी


 श्री शिवशंकर सरस जी, बोली के चउमास। 

उनसे छरकाहिल रहैं, तुक्क बाज बदमास।। 

सादर ही सुभकामना, जनम दिना कै मोर। 

रिमही मा हें सरस जी , जस पाबस का मोर।।  

हेमराज हंस 

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

गदहा परेशान है गईया के प्रतिष्ठा मा।।

 सुमर कै नजर नित  रहा   थी  बिष्ठा  मा। 

हमीं  कउनव सक नहीं ओखे निष्ठा मा।।  

सेंतय का  झारन  मा जरा  बरा जात  है 

गदहा  परेशान है  गईया  के प्रतिष्ठा मा।।   

हेमराज हंस 

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

उच्च कोटि के नीच

 

राहू अमरित पी  लिहिस, जनता ओसे हीच। 

अइसै हेमय समाज मा, उच्च कोटि के नीच।। 


कहिन भुसुण्डी सुन गरूड़, तजै सुभाव न नीच।

गंग नहा ले सुमर चह ,तउ पुन लोटय कीच।।

हेमराज हंस  

धरम ध्वजा फहरी


धरम ध्वजा फहरी अबध, भारत गउरव पर्ब । 

मानो  सीना   तान  के,  करय  सनातन  गर्व।।    

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

श्री हरि कुशवाह ,हरि ,

 श्री हरि कुशवाह ,हरि ,

मैहर के कवियों में कुशवाह हरि एक जाना पहचाना नाम है। जो चाहे हिंदी में अपने गीत य ग़ज़ल लिखे य बघेली में पर जो भी लिखा वह ठोक बजाकर । इसीलिए शायद किसी ने कभी उनके बारे में कहा रहा होगा कि,
जेमा न नंचिउ खोट त ओही खरी कहा थे,
गइल चलत मिल जाय त ओही डरी कहा थे।
बइठ मंच पुटपार्थी के साईं बाबा कस,
मइहर के मनई सब उनही हरी कहा थे।।
पेशे से नगरपालिका के बरिष्ठ लेखापाल पद से रिटायर श्री कुशवाह ,हरि , का एक बघेली काब्य संकलन भी प्रकाशित है।
आइये पहले उनके गजल से ही शुरुआत करते है।
मन मा उचय सबाल त कइसा करी फलाने,
कउनों सुनय न हाल त कइसा करी फलाने।
पनही मिली उन्ही ता बारी क रउद डारिन,
उनकर बढ़ी मजाल त कइसन करी फलाने।।
नउपर के तुपक दारी मूड़े म धरे गोरसी,
झूरय बजामै गाल त कइसन करी फलाने।
नङ्गा नहाय तउनव निचोमय के फिकिर मा,
बनिया बने कंगाल त कइसा करी फलाने।।
आपन न टेट देखय आने कै फूली झाकय,
दुनिया क यहै हाल त कइसा करी फलाने।
भूभुर करय क पोहगर खुरखुंद त कइ डारिन,
मुखियय बने दलाल त कइसा करी फलाने।।
केतनेव क खाय डारिस या तन्चबूदी रोटी,
पेटय बना बबाल त कइसन करी फलाने।
हाथी निकर ग सगला बस रहिगे पूछ् बाक़ी,
अब गामै उय बेताल त कइसन करी फलाने।।
चलनी म दूध दुहि के रोमय लिलार काही,
बिगड़ी है उनकर चाल त कइसन करी फलाने।
नव सौ गटक के मुसबा हज का चली बिलारी,
अधरौ लिहे मसाल त कइसन करी फलाने ।।
चाकी परी य देश मा लूडा लगाय दीहिंन ,
सइया बने कोतवाल त कइसन करी फलाने।
कइसन कही कि रानी बइठी चुनू सम्हर के,
राजा करी हलाल त कइसा करी फलाने।।
निबले कै तो मेहरिया सब कै लगा थी भउजी,
बुढऊ जो ठोकै ताल त कइसा करी फलाने।
लिलरी न जियत माछी हमसे सुना हरी तुम,
रहिगा यहै मलाल त कइसा करी फ़लाने।।
यह तो रही श्री हरि कुशवाह की ग़ज़ल अब उनके एक गीत का भी जायका लीजिये।सकबन्धे म प्रान फलाने बलम सोचय म झुखाने।
कोरे कागद अउठा दीहिंन ,
बंधुआ बन के करजा लींहिंन।
ब्याज बरे हमहू से बेउहर बहुत बेर फुहराने,
बलम सोचय मा झुखाने ।।
जब थाने मा रपट लिखामै,
उलटे उनही दपट भगामै।
हमही निबल कै जान मेहरिया रोज बोलामय थाने,
बलम सोचय म झुखाने।।
पेट पेंटागन जेठ दुपहरी,
बागा थे फिफियाँन कचेहरी।
खेती बारी कुरकी होइगे दूनव बैल बिकने,
बलम सोचय मा झुखाने।
हमरे बिधायक रसिया बड़े है,
जब देखय खटिया म पडे है।
उनही घर से दूरी राखय कउनों न कउनों बहाने,
बलम सोचय मा झुखाने।
इस तरह श्री हरि कुशवाह , हरि, अपने क्षेत्रीय मुहाबरे लोकोक्तियों और प्रतीकों को अपने कविताओ में सजोते हुए अनेक गीत और ग़जल लिखे है।

मंगलवार, 4 नवंबर 2025

तुम बत्तीसी काढ़ दिहा

तुम बत्तीसी  काढ़  दिहा औ खीस निपोरे चले गया। 
गील पिसान हमार देख परथन का बटोरे चले गया।। 


सिसकत राति से पूछि लिहा कस लाग पलेबा खेते मा 
तुम बिदुरात साँझ देखय का बड़े अँजोरे चले गया।। 


 गाय बिआन ता बनी पेंउसरी  पै पेटपोछना  नहीं  रहा 
पूरा दिन महतारी रोयी  तुम बिन मुँह फोरे चले गया।। 


जब से रोमा झारिस नफरत प्रेम का रकबा घटा खूब 
खसरा  माही  दर्ज  खैरिअत  झूंटय  झोरे चले गया।। 


काल्ह  फलनिया  कहत  रही या सरबार मा  गाज गिरै 
कउनव  साध न पूर भयीं , बस गउखर जोरे चले गया।।


चित्रकूट मा दीपदान का खासा जबर  जलसा भा हंस 
पै तोहार नजर  गदहा  हेरैं  ता उनखे  ओरे चले  गया।। 
हेमराज हंस - 

सीताफल पहिले कटहर रहा

 बघेली कविता 

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उइ कहा थें सीताफल पहिले कटहर रहा। 

ओखा  खांय   मा   बड़ा   अटहर     रहा।।

अब खिआत खिआत  होइगा चुनू बूदा। 

यतना सुनतै  एक बांदर डाल से कूदा।। 

कहिस काहे लबरी बतात्या है 

हमीं लगा थी गिल्लिआन । 

हम मनई बनै का 

घिस रहे हन आपन 

पूंछ पै आजु तक नहीं खिआन।।

अब हम डारबिन से मिलय का 

बनबाय रहे हन  बीजा। 

फुरा जमोखी करामैं का 

साथै लइ जाब एक ठे

 दुरजन   भतीजा। 

कहब की पच्छिम कै  बात 

पूरब माँ लागू  नहीं होय। 

आजा का जनम  नाती के

 आगू नहीं होय।।  

मनई कबहूँ नहीं रहा बांदर। 

हाँ जबसे हम श्री राम जू के 

सेना मा भर्ती भयन 

तब से समाज मा  खूब हबै आदर।  

तब से हमूं गदगद हयन मन मा। 

चित्रकूट अजोध्या औ  देखा 

बृंदाबन मा। 

✍️हेमराज हंस 

केत्ते अपराधी निता

 पूछ रही ही दलन से, दरबारन कै ईंट।

केत्ते अपराधी निता, ही आरक्षित सीट।।

सोमवार, 3 नवंबर 2025

हम उनही दिल दइ दीन्ह्यान

 हम उनही दिल दइ दीन्ह्यान अब गुर्दा माँगा थें। 

बारिस  मा  सब सरि गै धान  ता  उर्दा माँगा थें।।

स्वस्थ बिभाग के सेबा से गदगद हें सब रोग बिथा 

अस्पताल   से   हरबी    छुटटी    मुर्दा माँगा थें।। 

हेमराज हंस 

रविवार, 2 नवंबर 2025

विश्व विजेता बन गयीं


 विश्व विजेता बन गयीं, रच दीन्हिन इतिहास। 

भारत काही गर्ब  है, बाह बिटिअव सब्बास ।। 

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

कामिल बुल्के राम-कथा

 लेखक रेबरेंड फ्रादर कामिल बुल्के, एस० जे०, एम० ए०, डो० फ़िल० अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, सत जेवियर कॉलिज, राँची

१६६२ हिन्दी परिषद्‌ प्रकाझन प्रयाग विश्वविद्यालय 


थहाँ रामायण की आधिकारिक कथावस्तु से सीधा सबंध रखने बाले पात्रों का अभिप्राय है। विश्वामित्र, अगरूय, बसिष्ठ और भरद्वाज ऋग्वेद के ऋषि हैं, बाऊकाड और उत्तरकांड की विविध अंतरकथाओं के ” यात्रों के नाम वदिक साहित्य में मिलते है । उनका यहाँ पर उल्लेख नहीं होगा ।

TULSIDAS----- EK PAHELI

विद्यापति के समय अर्थात् पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वाद में ही हिन्दी में नाटक लिखने की प्रथा का सूत्रपात हुआ था। तब से लगभग दो सौ वर्ष पर्यन्त इस विषय में कई कारणों से कुछ भी न हो पाया । सत्रहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध में नेवाज कवि ने पहले पहल महा- कवि कालिदास के संस्कृत शकुन्तला नाटक के आधार पर 'शकुन्तला- उपासवान' लिखा जो उन दिनों को दृष्टि से अब तक नाटक के नाम से पुकारा जाता है। इस पुस्तक में और आजकल के लिखे हिन्दी नाटकों में बड़ा अन्तर है। परन्तु विद्यापति के नाटको से इसमें यह विशेषता है कि इसमें बिहारी नाटकों के समान मैथिली और संस्कृत की खिचड़ी देखने को नहीं मिलती। पूरी पुस्तक लगभग एक ही भाषा में है। एक बात स्मरण रखने योग्य है कि उर्दू साहित्य में भी नाटक का आरम्भ किसी हिन्दू द्वारा किये गए शकुन्तला के अनुवाद से ही फर्रुखरियर के समय में होता है। अठारहवीं शताब्दी के हिन्दी नाटककार, नाट्यकला की दृष्टि से, नेबाज से अधिक कुछ भी नहीं कर पाये देव तथा ब्रजवासी दास आदि के नाटक इस विषय में शकुन्तला - उपाख्यान से अच्छे नहीं कहे जा सकते । इन उपयुक्त नाटकों में न तो आधुनिक नाटकों के से टीक-टीक विभाग किये गए हैं और न स्थाना- नुसार पात्रों के आने-जाने अथवा और किसी प्रकार के नाट्य करने के संकेत ही दिये गए हैं। यह सभी वास्तव में कोरे काव्य के काव्य हैं। ऐसे ही नाटक उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वाद तक देखने को मिलते हैं। सन् १८५० के लगभग लिखे गए बिहारी कवि भानुनाथ झा के 'प्रभावती हरण' नामक नाटक में कुछ विशेषता अवश्य है, किन्तु वह भी बहुत थोड़ी । महाराजा विश्वनाथ सिंह के 'आनन्द रघुनन्दन नाटक की भी यही दशा है। आधुनिक हिन्दी नाटक लिखने का आरम्भ भारतेन्दु बाबु हरि- श्चन्द्र के अनुसार उनके पिता बाबू गोपालचन्द्र द्वारा लिखे हुए 'नहुप नाटक से होता है। यह पुस्तक सन् १८५७ के लगभग लिखी गई थी, किन्तु अब तक इसे पढ़ने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को प्राप्त हुआ होगा। इन्हीं बाबू साहब ने सर्व प्रथम हिन्दी में नियमानुसार महाकाव्य की रचना की थी। परन्तु इनका 'जरासन्ध-वध' महाकाव्य भी 'नहुप' नाटक के ही समान अभी तक देखने को नहीं मिला । उर्दू साहित्य में अच्छे नाटकों का श्रारम्भ इससे २० वर्ष बाद अर्थात् १८७७ से होता है और तभी से उर्दू नाटककार लगातार थोड़ी-बहुत उन्नति करते चले आ रहे हैं। हिन्दी साहित्य के नाटक विभाग के लिए ये दिन बहुत ही अच्छे थे। इसके कुछ ही दिनों के उपरान्त राजा लक्ष्मण सिंह, लाला श्री निवासी दास, पं.० केशवराय भट्ट, बाबू तोताराम, आदि ने कई नाटक लिखे । किन्तु इनमें से अधिकतर इतने बड़े-बड़े बन गए कि उनको आजकल, विना काँट छाँट किये खेलना असम्भव सा हो गया है। बदरीनारायण चौधरी का 'भारत-सौभाग्य' नाटक इसका सबसे बड़ा उदाहरण कहा जा सकता है। इस समय के नाटकों में सबसे अच्छे भारतेन्दु बाबूहरिश्चन्द्र के ही नाटक कहे जा सकते हैं। किन्तु इनके १८ वा १६ नाटकों में से सबके लिए ऐसा कहना भी भारी भूल है। इनके द्वारा अनुवादित नाटक विशेषकर अच्छे हैं। कभी-कभी तो उनमें मौलिक नाटक का भ्रम हो जाया करता है। इन सबके संब नाटकों में यह एक विशेषता है कि इन्हें किसी प्रकार रंगमंच पर खेल सकते हैं और भारतेन्दु-युग में रखें हुए नाटकों से इसी कारण, एक नये युग का आरम्भ होता है। इनके द्वारा अनुवादित तथा नये सिरे 0 से लिखित कुछ नाटकों में इतनी सफलता मिली कि बहुत से लोगों ने इन्हीं का अनुकरण करके नाटकों का लिखना आरम्भ कर दिया । संस्कृत, प्राकृत तथा अंग्रेजी नाटको का अनुवाद होने लगा। कभी नये, कभी सामाजिक, पौराणिक अथवा अत्यान्य प्रकार के नाटक मंच पर खेलने के उद्देश्य से लिखे जाने लगे । सबसे पहले सन १८६८ में 'जानकी मंगल' नामक हिन्दी नाटक काणी में खेला गया था । तब से यदि उचित परिश्रम हुआ होता और लोगों की रुचि इस ओर सफलता पूर्वक खिंची होती, तो आज तक हमारे नाटक सम्भव था, किसी भी दूसरी भाषा के नाटकों से कभी पिछड़ नहीं जाते । परन्तु ऐसा न हो सका और थोड़े ही दिनों के अनन्तर, फिर पुरानी प्रथा लोट आई। उधर मराठी, गुजराती तथा उर्दू और बंगला के नाटको के खेलने के लिए नाटक मण्डलियाँ वन कर तैयार हुई और इधर हिन्दी के कितने ही लब्ध प्रतिष्ट कविवर अपना बहुमूल्य समय पुरानी डफली पीटने में ही नष्ट करते रहे । संस्कृत नाटकों के अनुवाद तो वैसे थे ही, नये-नये पौराणिक नाटक तक अभी इस ढंग से लिखे जाते है जिन्हें दृश्य काव्य कहना मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं, इन्हें श्रव्य अथवा पाठ्य काव्य कहना कदाचित् अधिक उपयुक्त होगा। अन्य भारतीय भाषाओं के नाटकों की तुलना के लिए हिन्दी में अभी कुछ ही दिन पहले तक आधे दर्जन से अधिक नाटक नहीं निकल सकते थे ।  

तुलसीदासऔर उनका युग

 “'बरसत हरषत लोग सब करषत लखे  न कोय | 

तुलसी प्रजा सुभाग तें भूप भानु सो  होय ।॥

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“ऋवितावली' ( स-बाहुक ) का रचना-काल किसी वर्ष विशेषकों नहीं माना जा सकता । उसका


प्रगयन विस्तृत कालकी परिधिको घेरे हुए है। उसमें कविके आखिरी जीवनकी मंजिलके संकेत देनेवाले हन्द प्रकट करते हैं कि ये सं० १६८० में सचे गये ओर बहुतसे छन्द ऐसे मी हैं जो सं० १६८० के बहुत पहलेके हैं यथा, काशीकी महामारी, मीनके शनि तथा रुद्रबीसीसे सम्बन्धित छन्द | डॉ० माताग्रसाद गुप्तने 'ऋवितावली का अनुमानित रचना-काल सं० १६६१ से सं० १६८० तक ठहराया है! जो सबवथा समीचीन होनेके कारण भग्राह्म नहीं |

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विनयका रचनाकार : विनयपत्रिका को तुत्सीकी अंतिम कृति खीकार करनेमें किसीको कोई आपत्ति नहीं। डॉ० माताप्रसाद गुसने इसका र्वनाकाल सं० १६६१-१६८०के बीच ठहराया है |** उसे ग्रहण करनेमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए |

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'्रीकृष्णगीतावदी का रचना-काछ निश्चय करनेके लिए कोई अंतः साक्ष्य नहीं है। अतः इसके विषय-निर्वाह तथा शैढ्ीके अध्ययनके आधारपर डॉ० माताप्रसाद गुप्तने इस संबंध्रमें जो निष्कर्ष निकाला है उसे ग्रहण कर लेनेमें हमें कोई आपत्ति नहीं | गुप्तजीके अनुसार “श्रीकृष्ण गीतावी का रचना-काल सं० १६५८ के लगभग ठहराया गया है |

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गीतावली' के स्वनाकाछका कोई निश्चित प्रमाण नही मिलता | ग्रन्थकी शैली, उसमें समाविष्ट प्रसंगों आदिको दृष्टिमं रखकर विद्वानोंने अपने-अपने विचार प्रकट किये हैं | डॉ० माताग्रसाद गुप्तका अनुमान हमें बहुत कुछ संगत प्रतीत होता है। गुप्तनीके अनुसार गीतावढी' का अनुमित रचनाकाछू सं० १६५३ ठहराया गया है |

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पार्वती मंगल का रचना काल ग्रंथमें ही इस प्रकार दिया गया है--


“जय संबत, फाशुन सुदि पाँचे, गुर दिनु। अस्विनि बिरचेडें मंगछु, सुनि सुख छिनु-छित्ु' ॥”


जय वाहस्त्य वर्ष-प्रणालीका एक वर्ष है। यह सं० १६४३ में पड़ा था । अतः अंथकी रचनातिथि सं० १६४३, फाव्गुन शुक्ला पंचमी, दिन बवृहस्पतिकों मानी जाती है ।

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जानकी-मं गछ :--1627 SAMBAT

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महात्मा तुलसीदासके क्रान्तिकारी स्वरूपक दर्शन उनके जिन कार्योंसे हाते ह उनका संकेत नीचे दिया जा रहा है-(के ) साम्प्रदायिक संघर्षाकों मिटाना और समन्वय खापित करना । ( ख ) संस्कृतकों छोड़ लोक भाषासें लिखना | (ग ) विशिष्ट व्गकीं छोड़कर जनतासे अपनेकों जोड़ना । (घ ) भक्तिक्े द्वारा भगवानकी प्रामिके मार्गकी सबके लिए सरहू एवं सहज बनाना | ( & ) समाजकों संगठित करन, दिशा देंने, उदबीधन करने, तथा भले-बुरेकी पहचान करनेकी कसौटी बताना । ( ञ्र) हिन्दु-ध्मको संस्कृत भाषाके कठघर से निकाछ कर लोक-मापषासे लाना । (छ ) भारतीय संस्कृतिकों विदेशी प्रभावसे बचाना । (ज ) अर्द्धनिद्रा, निराशा और पराज़यके भावमे पढ़े हिन्दू-समाजकों अपने बिखराबके प्रति सचेत करना | (झ ) विदेशी यबन प्रशासकोंकी चर्चा या निन्‍्दा किये बिना भी हिन्दू-जीवनस एक बार पुन; आत्म-विश्वास जगाना |

DR. RAJ PATI DIKSHIT BHU 

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तु आर उनका युग


कक


खेती न किसान को, मिखारी का न भीख, वलि, वनिक को बनिज, न चाकर को चाकराी।

 जीविका विहीन छोग सीद्यममान सोच वस, कहे एक एकन्ह्र सों, 'कहाँ जाई का करी ?

' दहाँ. पुरान कही, छोफहें बिछोकियत, साँकरे सबे पे राम! गराबरे कृपा करी।

 दारिद-द्सानन दवाई दुनी, दीननबंधु ' दुरित-दहलि देखि तुलसी हु हा करी ॥

' कविता० उत्तरकाण्ड छ० ९७ किसान जो भारतके आ्िक जीवनका केन्द्र रहा है उसकी इस दक्शाको दिखाकर कविने मामों समूचे समाजकी गरीबीकी बात कह दी | जीविका विषहदीन छोग सीच्रमान, सोच बस' से जीवनकी बेकारी का बड़ा ही मामिक चित्रण हुआ है । समाजकी नतिक स्थिति और सामाजिक व्यवस्थाकी बुगइयोंपर कशाघात करते हुए तुलसीदास कहते ईं-

-'राज समाज कुसाज कोटि कु कछरूपित कछुप कुचाल नहे हे! 

नीति, प्रतीति श्रीति परमित पति हेतुवाद हठि हेरि हुई है।॥

 आश्रम-बरन-धरम-विरद्धवित जग, छोक-बेद-मरजाद गई हे।

 प्रजा पतित, पाखंड पाप रत, अपने अपने रंग रह हे। सांति, सत्य, सुभ रीति गई 

घटि, बढ़ी कुरीति कपट कलई हे | 

सीदत साधु, साधुता सोचति, खल बविछसत, हुलूसत खलई है ।।

 ( बिनय० पद १३५९ ) सामाजिक विघटमकी स्थितिका इससे मार्मिक वर्णन ओर क्या हो सकता है? सामाजिक संकथकी विभीषिकाकों पहचाननेवाला तुल्सीसे बढ़कर अथवा उनके समकक्ष भी कोश दसरा कवि नहीं | जो छोग आजकी सामाजिक स्थिति ओर संकटका वर्णन कर रहे है उनके लिए भी ऊपरकी पंक्तियाँ मीलके पत्थरद्रे समान है | आनस' के भरत सच्चे अर्थम आधुनिक क्रांतिकारी युवककी कोटिमें बिठाये जा सकते है। वे पिताकी आशा, वेदोंकी अगुआ समाजकी मान्यताके कायल नहीं | अत्यन्त शिष्ववाणीमें उन्होंने वसिध्से कहा कि आप जड़ता ओर मोहके वशर्म होकर ही मुझ जेसे अधमसे राज्य-सुख चाहते हैं । बे नतो लोक के व्यंग्यकी परवाह करते हैं न कि पिताक़ी आज्ञा नहीं माननेसे परलोक सुखसे वंचित होना पड़ेगा इसकी चिंता करते हैं। उन्हें दुःख केवल इस बातका है कि उनके कारण राम-लशक्ष्मण-सीताको कष्ट उठाना पढ़ रहा ६--



बे


डरू न भोहि जग कहहि कि पोचू | पर छोकहु कर नाहि न सोचू ।।


एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि छमिं भे सिय राम दुखारी ॥।' यहापर भरतका चरित्र सर्वोत्तम मानवीय रूपमें प्रकट होता है| यहाँ वे रामकों बड़े भाईके रुपमें नहीं देख रहे है। माता, पिता, गुरुकी उपेक्षा करनेवाला बड़े भाईकी भी उपेक्षा कर सकता था | किन्तु उन्हें कष्ट इसः बातका है कि उनके कारण किसी औरको दुःख सहना पड़ रहा है। इस दुःखसे कातर और छत्पटते हुए भरत अयोध्याकी प्रजा और स्वजनोंके साथ रामकों मना छामेके छिए उनके पास जाते दे ।========

जीवन-चरित-विचार- इस वर्गकी आलोचनाएँ जितने प्रचुर परिमाण में प्रस्तुत हुई है उसनेमें अन्य किसी प्रकारकी नहीं । आधुनिक कालके जिन विद्वानोंने इस क्षेत्र में किसी प्रकारका प्रवास किया उनमें एच० एच० विल्सन, गासी द तासी, एक एस० ग्राउस, शिवसिंह सेंगर, बिर्सन, ई० ग्रीब्ल, इण्डि यन प्रेससे प्रकाशित 'मानस'की भूमिकाके लेखकगण, लाला सीताराम, इन्द्रदेवनारायण. शिवनन्दन सहाय, 'तुलसीग्रन्थावली' तृतीय भागके सम्पादकगण, रामकिशोर शुक्ल, रामदास गौड़, श्यामसुन्दर दास और पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, सोरों जिला एटाके गोविन्दवल्लभ भट्ट शास्त्री, गौरीशंकर द्विवेदी, रामनरेश त्रिपानी, रामदत्त भारद्वाज, भद्रदत्त शर्मा, दीनदयाल गुप्त तथा माताप्रसाद गुप्त प्रभृति सज्जनोंके नाम उल्लेखनीय हैं।

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अब शिवसिंह सेंगरको लीजिये । उन्होंने सन् १८७७ ई० में अपने ग्रन्थ 'सरोज'में तुलसीकी एक संक्षिप्त जीवनी प्रस्तुत की, उसीमें किन्हीं पसकानिवासी बेनीमाधवदास रचित एक बृहत् 'गोसाई-चरित'की सूचना दी, साथ ही यह भी लिखा कि उक्त अन्य आपकी चक्षुरिन्द्रियका विषय भी हो चुका था। परन्तु उससे इसका कोई आभास नहीं मिलता कि इन्होंने उक्त अन्यके आधार पर अथवा स्वतन्त्र रीतिसे गोस्वामी- जीकी जीवनी लिखी और न यही पता है कि सेंगरजीने उक्त ग्रन्थ कहाँ देखा था। उनके इस अधूरे संकेतसे कविके प्रेमियोंका कुतूहल शान्त न हुआ और कालान्तरमें उस ग्रन्थको लेकर भी तुलसी के जीवन चरितलेखकोंमें बहुत क्षोद क्षेम रहा; पर उससे कोई प्रयोजन सिद्धि न हुई। प्रियर्सन साहबने जो कुछ लिखा है वह सन् १८८६ ई० में प्रकाशित उनके 'माडर्न वार्नाक्युलर लिटरेचर आव् हिन्दुस्तान में है। इसके अनन्तर उन्होंने सन् १८९३ ई० की 'इण्डियन ऐण्टीक्वेरी में अपने 'नोट्स आन् तुलमीदास'के तीसरे खण्डमें जीवन वृत्तसे सम्बद्ध कथानकों और जनश्रुतियोंका संग्रह उपस्थित किया । सन् १८६८ ई० में 'डेट आबू कम्पोजीशन आव तुलसीदासस् कवित्त रामायन के दूसरे नोटमें तुलसीकी मृत्यु प्लेगसे हुई, यह निर्णय किया । प्रियर्सनने जो विचार किया है वह अवश्य ही बहुत-कुछ युक्त एवं गम्भीर है। इन्होंने जन-श्रुतियों को छान-बीनकर ग्रहण किया है। इसका परिणाम यह हुआ कि इनके परवर्ती आलोचकोंमेसे अधिकांशने इन्हींकी खोजसेलाभ उठाया है सन् १८९० ई० की 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' में प्रकाशित ग्रीब्जका एक छोटा लेख 'गुसाई तुलसीदासका जीवन चरित' यद्यपि जीवनीविषयक कोई नवीन बात नहीं बताता, पर अपनी सुन्दर शैलीके कारण मोहक है। ग्रीजने अंग्रेजीमें हिन्दी-साहित्यका जो इतिहास लिखा है उसमें भी अत्यन्त संक्षेप, किन्तु बड़े ही आकर्षक ढंग से तुलसीके जीवन वृत्तकी चर्चा की है।

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राजपति दीक्षित


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

उनही काजू कतली औ हमरे निता फूटा

       बघेली कविता 

उनही  काजू   कतली औ  हमरे निता  फूटा। 

लें  का  हो  ता लइ  ल्या  नहीं  हेन  से  फूटा।।  


रात  दिन  हम धींच कुटाई। 

खुदय गिरी औ तुहीं उचाई।।  

महुआ  हम  बीनी  औ  तुम  लाटा  कूटा। 


घरय  जइ ता  धाबय  टोरिया। 

हरबिन मोर थथोलय  झोरिया।।  

बपुरी   बहुरिगै   लिहे     मन   टूटा।


मालकिन कहय बाह करतूती। 

येसे   नीक  लगा  ल्या  भभूती। । 

जेही मान्यन मगरोहन वा ता निकरा खूंटा। 

उनही  काजू   कतली औ  हमरे निता  फूटा। । 

हेमराज हंस 

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

महंती देखि के

 हम ता बेलकुल चुप्प हन उनखर   महंती देखि के। 
पै अपनौ पचे  मउन हन उनखर  कुसंती देखि के।। 

ना  राम  रमउहाल  ना  साहब  सलाम  पैलगी 
हम ता चउआन हन  इरखा कै खंती  देखि के।। 

आसा  ही  राम दै की   बहुरिहैं  अपनव  दिन
 मरय का मन परा थै उनखर जयंती देखि के।। 

केतनेव  क्वारा उजरि  गें  नकली  दबाई मा 
पुलिस लउट आयी गरे मा  बैजन्ती देखि के।। 

फुर कहब  ता  हंस  करू सब दिना रहब 
चुआ थी   लार  इंद्र कै  दमयंती   देखि के।। 
हेमराज हंस 





सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

सन्त तुलसीदास और उनका हनुमान चालीसा

 सन्त तुलसीदास और उनका हनुमान चालीसा रामदूत बजरंगबली हनुमान् के परम भक्त सन्त तुलसीदास गोण्डा जनपद के मध्यकालीन प्रमुख अवधी कवि हैं। तुलसी नाम से हिन्दी साहित्य में तीन कवियों की चर्चा है- एक मानसकार तुलसी, दूसरे घट-रामायण के रचयिता हाथरस वाले तुलसी, तीसरे हनुमान चालीसा के रचयिता गोण्डा वाले तुलसी। यहाँ हम हनुमान चालीसा के रचनाकार तुलसी के विषय में चर्चा कर रहे हैं। हिन्दी विद्वानों में यह एक बड़ी भ्रान्ति है कि हनुमान चालीसा भी मानसकार तुलसी की ही रचना है, जबकि सत्य यह है कि इसके रचयिता तुलसीदास गोण्डा जनपद के बलरामपुर और अब तुलसीपुर तहसील में स्थित भवनियापुर ग्राम के निवासी और जाति के कुर्मी तथा स्वभाव से परम सन्त थे। मानस चतुश्शती के अवसर पर नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित तुलसी-ग्रन्थावत्ती में उपलब्ध टिप्पणी में कहा गया है कि 'गोस्वामी जी के नाम से प्रसिद्ध ग्रन्थों में हनुमान चालीसा की बड़ी प्रतिष्ठा है, किन्तु लगभग 30 वर्ष पहले सन् 1940 ई.में कल्याण में श्री विनायक जी का 'गोस्वामी जी के नाम-राशि' शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें लिखा था कि गोण्डा जिले का तुलसीपुर गाँव बसाने वाले देवीपाटन निवासी तुलसीदास ने हनुमान-चालीसा लिखा था। दो-तीन वर्ष पूर्व भोपाल के 'तुलसीदास' पत्र में भी एक लेख था कि 18वीं शताब्दी में भोजपुर के किसी तुलसीदास ने 'हनुमान-चालीसा' लिखा। हनुमान-चालीसा की भाषा और शैली में भी स्पष्ट है कि यह गोस्वामी जी की रचना नहीं है। यह जनश्रुति प्रचलित है कि सन्त तुलसीदास नाम के एक कवि गोण्डा जनपद की बलरामपुर तहसील के अन्तर्गत स्थित देवीपाटन के दक्षिण-पूर्व निकट ही बसे भवनियापुर गाँव में 18वीं शताब्दी में पैदा हुए थे। इनके पूर्वज राप्ती नदी पर स्थित भोजपुर से आकर यहाँ बस गये थे। ये जाति के कुर्मी थे। युवावस्था में ही इनके हृदय में वैराग्य उत्पन्न हो गया था और ये घर छोड़ कर देवीपाटन से 17, मी. पूर्व कुटी बनाकर रहने लगे थे। उसी स्थान पर उन्हीं के नाम पर तुलसीपुर गाँव बसा जो बाद में चलकर एक अच्छा कस्बा हो गया। 'घट-रामायण' के रचयिता तुलसी साहब के ही समान ये सन्त भी अपने को गोस्वामी तुलसीपास का अवतार मानते थे और हनुमान जी को अपने इष्ट रूप में पूजते थे। यह भी बताया जाता है कि इन्हें हनुमान जी सिद्ध थे। कम पढ़े-लिखे होने पर भी इन्होंने जो कुछ लिखा है, वह हनुमान जी की कृपा से ही। हमने भवनियापुर जाकर देखा है। वहाँ आज भी हनुमान जी की एक भव्य मूर्ति विद्यमान है। यह भी बताया जाता है कि सन्त तुलसीदास ने 'हनुमान चालीसा' के अतिरिक्त 'लवकुश काण्ड' तथा 'हनुमान साठिका' नाम से दो और पुस्तकें लिखी थीं।

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

विश्व कवि गोस्वामी तुलसी दास ०२

विश्व कवि गोस्वामी तुलसी दास  ०२ 

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 भारतीय भाषाओं के विकास एव इतिहास के प्रति अपनी अनभिज्ञता पर श्रावरण डाल कर जान अथवा अनजान में त्रिपाठी जी ने एक तथ्य की अवहेलना की है, और पाठकों पर भी उस भ्रान्त धारणा को लादना चाहा है। भाषा के इतिहास का थोड़ा भी जानकार व्यक्ति इस बात को भली भाँति समझता है कि हिन्दी क्रमश सस्कृत, पालि, प्राकृत और अपनश की अवस्थाओं के बीच विकसित होती हुई अपने आधुनिक रूप में आई है और तुलसी के बहुत पहले कधीर, जायसी प्रभृति कवियों के काल में ही साहित्य क्षेत्र के अन्तर्गत माकृत न तो बोलचाल की और न साहित्य की ही भाषा के रूप में प्रचलित रह पाई थी। इस ऐतिहासिक दृष्टि से न विचार कर साधारण दृष्टि से ही देखें, तो भी तुलसी का केवल अपने एक ग्रन्थ में एक स्थन पर 'प्राकृत कवि' (जे प्राकृत कवि परम सयाने । भाष जिन्ह हरिचरित बखाने (1) का उल्लेख, उनकी भाषा को 'प्राकृत' का अर्थ दे देने में असमर्थ है। यहाँ पर 'भाषा' से हिन्दीके अर्थ का तथा 'भाषा-व्याकरण से हिन्दी-व्याकरण के ही अर्थ का बराबर ग्रहण होता आया है, न कि 'प्राकृत' का।

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आध्यात्मिक पथ के प्रसिद्ध साधक गोस्वामी तुलसीदास सिद्ध कवि और वाणी केसम्राट् थे । भाषा पर उनका असाधारण अधिकार था। साथ ही उनकी रचनाओं की विशेषता इस बात में है कि उनके भीतर उनका अपना भाषाविषयक निजी दृष्टिकोण व्याप्त है। तुलसी का यह दृष्टिकोण वर्षों से साहित्य के अन्तर्गत चली आती हुई लोक-भापा के व्यवहार की परम्परा में एक महत्त्वपूर्ण स्थिति का द्योतक है। वे अपनी लगभग सारी व्यक्तिगतप्रवृत्तियों के भीतर समकालीन भाषा-सम्बन्धी मान्यताओं का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते दिखाईदेते हैं। यही कारण है कि उनकी भाषा उनकी विभिन्न रचनाओ में विविध रूप-रगो के साथ विद्यमान है । 

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तुलसी की अपनी भाषाविषयक धारणा का सकेत, उनके दो ग्रंथो में हुआ है- (१) दोहावली (२) रामचरितमानस । 'दोहावली' के अन्तर्गत वे कहते है :- का भाषा का संस्कृत, प्रेस चाहिये साँच ।
 काम जु आवै कामरी, का लै करें कुमाच ॥ 
और 'मानस' में इसी प्रकार का कथन है:- 
भाषा बद्ध करवि मैं सोई । मोरे मन प्रबोध जेहि होई ॥ 

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भापा बोलि न जानही, जिनके कुल के दास ।
 भाषा कवि भो मंद मति, तेहि कुल केशवदास ।।  केशव 
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 जब से तुलसीदास की रामायण का प्रचार बड़ा, तब से वेदों के प्रति जनता की श्रद्धा तथा उनके अध्यन की अभिरुचि ही समाप्त हो गई। उनकी समझ में वैदिक साहित्य के प्रचार एव प्रसार में तुलसी का रामचरितमानस एक बडा भारी कटक रहा है ।
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इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि तुलसी का युग राजनैतिक दृष्टि से एक ऐसा युग था, जिसका शासन सूत्र ऐसे मुसलमानो के हाथ में था, जो अभारतीय भाषा-भाषी तथा बहुत अशों में भारतीय भाषा-विरोधी थे । इस समुदाय की रग-रग में अपने धर्म और अपनी सस्कृति के साथ-साथ अपनी भाषा के प्रचार की प्रवृत्ति भी बहुत प्रबल थी और किसी न किसी साधन द्वारा उसका भी जनता में प्रचार करना उनका एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम बना हुआ था। यहाँके सामाजिक जीवन की अन्य अवस्थाओं की भाँति भाषा-सम्बन्धी धारणाओं को भी अधिक तीव्रगति से प्रभावित करने के अभिप्राय से राजकीय क्षेत्र में तदनुकूल परम्पराएँ चलाई गई। इनमें सबसे अधिक उल्लेखनीय है सारी भारतीय भाषाओं की अवहेलना करके फारसी को राजभाषा वनाना
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कवि जिस भाषा में रचना कर रहा है उस भापा का कोई प्रामाणिक व्याकरण कवि के रचनाकाल में स्थिर हो चुका है या नहीं, यह प्रश्न भी महत्त्व का है क्योंकि बिना व्याकरणव्यवस्था के कवि द्वारा उसके नियमों के अनुसरण की चर्चा ही व्यर्थ है।
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  रामचरितमानस हिन्दी-भाषियों का प्राण है,
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 अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लक्षणा लीन । 
अधम व्यंजना रस कुटिल, उलटी कहत नवीन ।।
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तिन्ह तें खर सूकर स्वान भले जड़ता बस ते न कहूँ कछु वै । तुलसी जेहि राम सों नेह नहीं,सों सही पसु पूँछ बिधान न है । जननी कत भार मुई दस मास भई किन्छ बॉक गई किन वै । जरि जाउ सो जीवन जानकीनाथ जिये जग में तुम्हरो बिनु है ॥ 
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अतुलित महिमा वेद की, तुलसी किये विचार । जो निदित निदित भयो, विदित बुद्ध अवतार ॥ 

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 तुलसी की रचनाओं का क्रम इस प्रकार जान पड़ता है :- रामललान इछू, वैराग्य सदीपिनी, रामाशाप्रश्न, जानकीमगल, रामचरितमानस, पार्वतीमगल, बरवै रामायण, विनयपत्रिका,दोहावली, कवितावली,गीतावली, और श्रीकृष्णगीतावली ।
 

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

विश्व कवि गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास 

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रत्नावली तथा तुलसी को चरितनायक बनाकर अनेक कृतियां हिन्दी में लिखी गयी हैं, जैसे
-- १ रत्नावली (काव्य) २- तुलसीदास (खण्ड काव्य) ४ ३- तुलसी दास (नाटक) तुलसी दास ५- सन्त तुलसी दास उत्तरायण (महाकाव्य) मैथिली शरण गुप्त सूर्यकान्त त्रिपाठी " निराला" उदय शंकर भट्ट कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह डा० राम कुमार वर्मा ६- 19- रत्ना की बात डा० राम कुमार वर्मा डा० प्रेम नारायण टण्डन मानस का हंस (उपन्यास) अमृतलाल नागर ξ- रत्नावली चरित जय गोपाल मिश्र १०- सोरों का संत रामकृष्ण शर्मा आदि । 
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'भारतीय हिन्दी परिषद् के तत्त्वावधान में दिल्ली विश्वविद्यालय में ३१ मई१६६० को डॉ० धीरेन्द्र वर्मा की अध्यक्षता मे एक विचार गोष्ठी हुई। इसका विवरण६ जून १६६० के साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ। विभिन्न विचार सत्रो मेआचार्य विनय मोहन शर्मा, आचार्य नन्द दुलारे बाजपेयी, डॉ. नगेन्द्र, पं० वेदव्रतशास्त्री, डॉ राम दत्त भरद्वाज, डॉ. उदयभानु सिंह, डॉ. गोवर्धन लाल शुक्ल, श्रीरामनरेश त्रिपाठी, डॉ० माता प्रसाद गुप्त, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्यविश्वनाथ प्रसाद मिश्र आदि विद्वान सम्मलित हुए। इनमें डॉ. हरवंश लाल शर्मारामनरेश त्रिपाठी, पेदव्रत शास्त्री और डॉ० राम दत्त भारद्वाज सोरों के समर्थन मेथे, शेष उसके विरोध में तुलसी साहित्य के शीर्षस्थ विद्वान आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने घोषित किया कि सोरों समर्थक ये गजेटियर जनश्रुतियो परआधारित हैं, इसलिये मान्य नहीं है। एक ही गजेटियर में सोरो का नाम है औरमहेवा का भी उल्लेख है,जिसे राजा पुर बांदा के पक्षधर तुलसी की ससुराल मानतेहै। इस प्रकार इन गोष्ठियों में सोरों विषयक सामग्री को प्रमाणपुष्ट नहीं मानागया। पं० वेद व्रत शास्त्री (सोरों) का मत है कि गोष्ठी अनिर्णित रही, जबकिअधिसंख्य प्रतिभागियों का मत है कि सोरो पक्ष निरस्त हो गया था।
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लखनऊ गोष्ठी लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में ६,७ जनवरी १६६७ को एकराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया और उसमें राजापुर (बादा) सोरों (एटा)और राजापुर (सूकरखेत,पसका गोण्डा) से जुड़े समस्त विद्वानो को आहूत कियागया कि वे अपने-अपने साक्ष्यों एवं प्रमाणों का सार्वजनिक प्रदर्शन करें। पुरानेदस्तावेज की मूल जाँच करके और बहस सुनकर निर्णय देने का दायित्वउच्चन्यायालय (लखनऊ पीठ) के दो अवकाश प्राप्त न्यायमूर्तियों (जस्टिस सहायऔर जस्टिस माथुर) को सौंपा गया। इस गोष्ठी में बाँदा,एटा,गोण्डा तीनों कोएक-एक सत्र दिया गया। तीनों के अपने चुने हुए आठ-दस वक्ता मंच पर आयेऔर समय की सीमा में उन्होनें अपने-अपने तर्क रखे । चौथे सत्र (खुले अधिवेशन)मे श्रोताओं की टिप्पणियां सुनी गयीं, परस्पर शास्त्रार्थ हुआ और फिर दोनोन्यायमूर्तियो की व्यवस्था के अनुसार निर्णय को इसलिये सुरक्षित रख लिया गयातुलसी जन्मभूमि &o कि कुछ विद्वान अपने साथ मूल प्रमाण नहीं ला पाये थे। न्यायमूर्तियों का यह भीविचार था कि यथासमय वे स्थल - निरीक्षण भी करेंगे। किन्तु एतदर्थ साधन सुलभनहीं हो पाये। इस गोष्ठी में सोरों पक्ष से पं० देवव्रत शास्त्री के नेतृत्व में अनेकविद्वान लखनऊ आये। राजापुर बादा का नेतृत्व पाण्डेय बन्धु ने किया। राजापुर(गोण्डा) का नेतृत्व डॉ० भगवदाचार्य ने किया। विभिन्न विश्वविद्यालयों महाविद्यालयोके विद्वान शोधार्थी,पत्रकार और तुलसी के प्रबुद्ध पाठक भारी संख्या में इसमेसम्मिलित हुए। इस गोष्ठी में राजापुर (गोण्डा) का पक्ष प्रबल रहा। 

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सनातन धर्म परिषद की गोष्ठियां विगत २३ अप्रैल ६४ को लखनऊ में एक विचार-गोष्ठी प्रदेश के पूर्वमुख्यमंत्री पं० श्रीपति मिश्र की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। मुख्य समागत न्यायमूर्तिश्री तिलहरीने इसमें स्पष्ट उद्घोष किया कि तुलसी अवध अंचल में ही जनमे थे।विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० महेन्द्र सिंह सोढा और हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो० सूर्यप्रसाद दीक्षित ने इस खोज की प्रक्रिया पर विस्तृत प्रकाश डाला। इस गोष्ठी केअनेक वक्ताओं, शिक्षकों, पत्रकारों साहित्यकारों ने राजापुर (गोण्डा) के जन्म भूमिहोने की पुष्टि की । सनातन धर्म परिषद की बम्बई संगोष्ठी (१६६८) हिन्दी साहित्यसम्मेलन प्रयाग संगोष्ठी तथा हिन्दी संस्थान लखनऊ में आयोजित संगोष्ठी काभी यही प्रतिपाद्य रहा। परिषद् ने अनूप जलोटा, श्री लल्लन प्रसाद व्यास आदिके कई कार्यक्रम यहां आयोजित करायें हैं। विगत २ अगस्त १६६६ को राजापुर(गोण्डा) में आयोजित संगोष्ठी में पं० राम किंकर उपाध्याय जी ने घोषणा की'आज मैं गोस्वामी जी की जन्म भूमि में आ गया हूँ । इस गोष्ठी में अयोध्या केअनेक सन्तों तथा कई प्रमुख हिन्दी विद्वानों ने अपने-अपने उद्गार व्यक्त किएजिनमे उल्लेखनीय है- सर्वश्री नृत्यगोपालदास जी, माधवाचार्य जी,राममंगलदास जी, पं० बलदेव प्रसाद चतुर्वेदी,रामानुजाचार्य जी, स्वामी पुरषोत्तमाचार्य जी।इसी क्रम मे २० अगस्त १६६६ को वाल्मीकि भवन, अयोध्या में "तुलसी सम्मेलनआयोजित किया गया, जिसमें प० श्री पति मिश्र एवं स्वामी नृत्यगोपालदास नेसूकरखेत के पक्ष में महत्वपूर्ण वक्तव्य दिये। वस्तुतः सनातन धर्म परिषद् और डॉ०भगवदाचार्य की सक्रियता इस क्षेत्र में सर्वाधिक सराहनीय है। 

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राजापुर गोष्ठी 'तुलसी सेवा समिति' राजापुर (बाँदा की ओर से १० अगस्त १६६७ को एकसगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमे अनेक विद्वान (तुलसी विशेषज्ञ) सम्मिलितहुए। इस अवसर पर "राजापुर तुलसी की गाथा नामक एक स्मारिका भीलोकार्पित की गयी। इस स्मारिका का समवेत स्वर यही है कि विद्वानों ने राजापुर(बॉदा) के अतिरिक्त तुलसीदास की जन्म स्थली अन्यत्र होने की सम्भावना व्यक्तकी है,जो विकृत मस्तिष्क का अनर्गल प्रलाप है। और यह एक षड़यन्त्र है। इनविद्वानो के मतानुसार तुलसी जन्म स्थली का विवाद ही नही उठाया जाना चाहिएथा। वे यह तो मानते हैं कि राजापुर (दादा) में तुलसी के पैदा होने का कोई पुष्टप्रमाण (यानी सनद नही है,लेकिन पिछले २०० वर्षों से राजापुर (बाँदा) को हीअधिकतर विद्वानों ने जन्मस्थली मान रखा है, इसलिये उसके समक्ष अब प्रश्नचिन्हनहीं लगाया जा सकता है। इन विद्वानों को यह समझा पाना कठिन हो गया हैकि अनुसंधान के क्षेत्र में कोई भी मान्यता अंतिम नहीं होती, इसलिये नये तथ्योएव तक के आधार पर पुनः पुनर्विचार करते रहने के लिये हमें अपने मस्तिष्क केगवाक्ष सदैव खोल कर रखने होंगे। इन संगोष्ठियों में जितनी दलीलें दी गयी हैं, वे दीर्घकाल तक तुलसी केचित्रकूट वासी होने का प्रमाण हैं, जबकि प्रश्न जन्मस्थली का है। प्रसिद्ध उक्तिहै- "वादे वादे जायते तत्वबोध । हमें आशा करनी चाहिए कि इन विचारगोष्ठियोद्वारा हम कभी न कभी किसी समवेत निष्कर्ष पर पहुंचेगें। अब वह समय दूर नहींहै, जब क्षेत्रीय राजनीति अथवा रागद्वेष का ज्वर और ज्वार थम जायेगामानसकार की अन्तःप्रेरणा से हिन्दी लोकमानस में सद बुद्धि पूर्ण साहित्यिक न्यायका संचार होगा और तब नीर क्षीर विवेक के सहारे तुलसी की जन्मस्थली का सगतसमाधान भी प्राप्त हो जायेगा।

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गोस्वामी जी के जीवनवृत्त के सम्बन्ध मे विभिन्न तिथियों के उल्लेख किये गये हैं। उन पर भी विचार करना आवश्यक है। उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं और रचनाओं के वर्ष विद्वानों ने इस प्रकार निर्धारित किये हैं- १. जन्म सं० १५५४ श्रावण शुक्ल सप्तमी २.यज्ञोपवीत (सं० १५६१) शिक्षा रामानंद पीठ काशी में गुरुशेष सनातन जी के साथ । ३. रामलला नहछू की रचना- (सं०१६१६) पार्वती मंगल (१६१६) जानकी मंगल (१६१६) ४. गीतावली की रचना सं० १६१६ ५..श्री कृष्ण गीतावली की रचना (१६१६ से १६२८ के मध्य) ६ कविन्त रामायण (कवितावली) - १६२८ ७. 'श्री रामचरितमानस रचनारंभ वैशाख ६,१६३१ समाप्ति रामविवाह सं० १६३३८विनय पत्रिका सं० १६३६ ६. दोहावली, सं० १६४० १०. सतसई, सं० १६४२ ११. बरदै रामायण, हनुमान बाहुक, वैराग्य संदीपनी,रामाझाप्रश्न सं० १६७०/१२. निधन श्रावण कृष्ण ३सं० १६८० इन तिथियों से स्पष्ट है कि उनका रचनाकाल ६२ वर्ष की अवस्था से शुरू हुआ और ११६ की आयु स० १६७० (५४ वर्षो) तक चलता रहा। १३. जीवन के अन्तिम १० वर्षों तक गोस्वामी जी ने कोई लेखन कार्य नही किया। १४. उन्हें कुल १२६ वर्षों का जीवन मिला। इस अवधि मे उन्होंने अकबर (१५६३-१६०५),जहांगीर (१६०५-१६२७) शाहजहाँ और औरंगजेब का शासन काल देखे ।

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गोस्वामी जी ने "रामचरितमानस” में चूँकि सूकरखेत का उल्लेख कर दियाहै, इसलिये राजापुर-चित्रकूट, सोरों और राजापुर (गोण्डा) के पक्षधर अपने-अपनेस्थानों को असली सूकरखेत सिद्ध करने में जुटे हुए हैं। विद्वानों ने मिलजुलकरपूरे देश में ३५ सूकरखेत खोज निकाले हैं। वस्तुतः सूकरखेत का सम्बन्धमहावाराह के उपासना क्षेत्र से है। प्रतिहारवंशी वाराहावतार या महावाराह कोआराध्य मानते हैं, इसलिये उत्तर भारत में जहाँ जहाँ प्रतिहारों का राज्य था, वहाँवाराह-वाराही के मन्दिर प्रायः मिल जाते हैं। चित्रकूट भी वाराहक्षेत्र में आता है।यद्यपि आज तक चित्रकूट से संबन्धित विद्वानों ने अपने आस-पास कहीं किसीवाराह मन्दिर या सूकरखेत का दावा नहीं किया था। अब तक उनकी मान्यता यहरही है कि तुलसी का जन्म यहाँ राजापुर में हुआ था। यज्ञोपवीत के पश्चातलगभग १५ वर्षों की अवस्था में वे सूकरख्त चले गये थे और वहाँ राम-कथासुनकर और फिर काशी में "नानापुराण निगमागम" का ज्ञान प्राप्त करके साहित्यसाधना में प्रवृत्त हुए थे। इस बीच उन्होनें राजापुर, अयोध्या, चित्रकूट एवं काशीमे निवास किया था। किंतु विगत दो-तीन वर्षों में चित्रकूट के पक्षधरों को यह लगा कि इसविवाद का काफी दारो मदार सूकरखेत पर है। इसलिये उन्होंने कामदगिरिपरिक्रमा मार्ग (चित्रकूट ) में एक ऐसी चट्टान खोज निकाली, जिसकी आकृतिकुछ-कुछ वाराह से मिलती हुई है। पास ही दो छतारियां मिल गयीं और एकपहाड़ी गुफा अथवा झोपड़ी। इन छतरियों पर वार्निश पेण्ट से गुरु नरहरि औरतुलसीदास का नाम लिखा दिया गया। वहाँ पर दो मूर्तियां रखा दी गयी और उसझोपड़ी को नरहरि आश्रम का नाम दे दिया गया। अर्थात् सूकर खेत वाराह मन्दिरऔर नरहरि आश्रम सब चित्रकूट में ही प्रकट हो गये। पहले यह तर्क दिया जारहा था कि राजापुर (बाँदा) में उत्पन्न कोई बालक लगभग ३५० किमी० की यात्राकरके सारों वाले अथवा लगभग २०० किमी० दूर पसका (गोण्डा)वालें सूकर खेततक कैसे पहुँच पायेगा? वहा बार बार कैसे जा सकेगा? जबकि परिवहन केसाधन थे नहीं? इस तर्क को निरुत्तर करने के लिये राजापुर से मात्र ३० किमी०की दूरी पर ही अब सारी व्यवस्था करा दी गयी है। चित्रकूट जैसे पवित्र तीर्थ मेतुलसी जन्मभूमि এ ढूंढने से न जाने कितनी गुफायें, अनाम खण्डित मन्दिर, छतरियाँ या समाधियाँ मिलजायेगी। मात्र एक झण्डा और एक साइन बोर्ड लगाकर रातो रात कोई भी साक्ष्य तैयार किया जा सकता है। यह अपकृत्य मात्र इस कथन का प्रमाण है किराजापुर चित्रकूट के पक्षधरों को अपना दावा दुर्बल प्रतीत होने लगा है और वे अब उसकी क्षति पूर्ति के लिये अन्य प्रकार के कृत्रिम साक्ष्यों को प्रायोजित करने में लगेहुए हैं।

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है कि सूकरखेत को भ्रम से सोरो मान लिया गया है। सूकर खेत गोण्डा जिले में सरयू के किनारे एक पवित्र तीर्थहै जहां आस-पास के लोग स्नान करने जाते हैं। यहां मेला लगता है" (हिन्दीसाहित्य का इतिहास, पृष्ठ १२६)

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प्रसिद्ध कथा वाचक बंदन पाठक ने दी है। उनकीमान्यता के आलोक में बालक राम जी विनायक ने एक "तुलसीनामावली" प्रस्तुतकी है। इस संबंध में एक लेखमाला जबलपुर के 'युगधर्म' के १४ जुलाई १९८५ मेआठ अंकों में प्रकाशित हुयी थी। इसके पीछे महंत गंगादास जी का कुछ अपनाशोध कार्य रहा है। इन सबके अनुसार चार तुलसीदास बताए जा रहें है-- तुलसी जन्मभूमि टे प्रमाण स्वरूप बंदन पाठक द्वारा रचित कविता के ये अंश प्रस्तुत किये गये"तैसे तुलसी चारि भये हैं नर भाषा के । चारो बरने रामचरित भगती रस छाके । एक महारिषि आदि कवि द्विज बंदन भये शापवश । मानसजुत बारह रतन प्रकटे धारे शांत रस ।। दूजे तुलसी तुलाराम जी मिसिर पयासी । देवीपाटन जनमकुटी तुलसीपुर बासी । तीसरि पत्नी रत्नावली कटु बचनहिं लागी । रोवत चले बिसारि भवन भये रसिक बिरागी । रामायन तिनहू रचे लवकुश मानस संत हित । द्विज बंदन 'जानकी विजय',गंगा कथा,क्षेपक सुकृत ।। तीजे तुलसी जनम नाम शुचि सोरों वारे । छप्पय, छन्दावली, कुण्डलियां, कड़खा चारे । चौथे तुलसी संत हाथरस वारे भारी । 'घंट रामायण' रचे सोहागिन सुरति बिहारी ।। द्विज बंदन तीनों कथै श्रीमानस छाया छुए मानस अधिकारी भले नाम उपासक सब भए ।। इनके अनुसार मध्य युग में समानान्तर ये चार तुलसी हुए हैं- मानस कार तुलसी (२) देवीपाटन (तुलसीपुर) वाले तुलाराम मिसिर उर्फ तुलसी(१) (3) सोरों (जिला एटा) वाले तुलसी (४) हाथरस वाले संत तुलसी । इन चारों की जन्ममृत्यु-तिथि, माता-पिता पत्नी आदि से युक्त वतथा रचनाओं का उल्लेख इस प्रकार किया गया है- In मानसकार तुलसी तुलाराम तुलसी सोरोंवाले तुलसी हाथरस तुलसी साहिजन्मतिथि श्रावणशुक्ल चैत्रशुक्ल उपलब्ध १८२० संवत७ संवत १५५४ एकादशी नहीं संवत् १६८७ सन्मभूमि 03 २. जन्मस्थान राजापुर देवीपाटन सोरों ३ निधनतिथि श्रावणकृष्ण ३ संवत् १६८० ४. बचपन का रामबोला तुलाराम नाम तुलसीदास गोसाई हाथरस ज्येष्ठ शुक्ल संवत् १८६६ या १६०० तुलसी साहिब ५ पिता का आत्माराम दुबे मुरारि मिश्र नाम ६. माता का हुलसी देवी नाम 19 पत्नी का (अविवाह) रत्नावली रत्नावली नाम (तीसरी पत्नी) ם. बचपन की अति दरिद्रता धनधान्य सामान्य सामान्य आर्थिक दशा युक्त सम्पन्न ६. वैराग्य का आत्मप्रेरणा पत्नी के पत्नी से आत्म प्रेरणा कारण वाक्वाण प्रेरणा १०. जीवनी के मूल गोसाई १. इतिवृत १. गुलिस्तां आत्मचरित स्रोत चरित, भवानी तुलसी -ए-बेदिल धटरामायण दास (बाबा २. तुलसी २. तुलसी बेनीमाधवदास) चरित तत्व प्रकाश ११. ग्रन्थ रामचरित मानस लवकुश छप्पय धटरामायण गीतावली काण्ड, रामायण, कविता वली गंगावतरण, कुंडलिया विनय पत्रिका जानकीस्तव रामायण, दोहा वली दंड,क्षेपक, छंदावली जानकी मगल स्फुट रामायण पार्वती मंगल कडरवा वैराग्य संदीपन रामायण रामलला नहहू, कृष्णगीतावली, रामाज्ञा प्रश्न, तुलसी जन्मभूमि बरवै रामायण 86) १२ प्रकाशक गीता प्रेस गोरखपुर वेंकटेश्वर मुशी नवल वेल्वेडियर प्रेस बम्बई किशोर प्रेस लखनऊ १८७४ ई०

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 तुलसीदास और उनकी कविता- इस अन्ध के अन्तर्गत श्री रामनरेश त्रिपाठी ने तुलसीदास जी के काव्य के अन्य पक्षों के साथ-साथ उनकी भाषा के विषय में भी यत्र तत्र स्फुट रूप में अपना विवेचन प्रस्तुत किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उक्त विवेचन के पीछे त्रिपाठी जी के किसी विशेष शास्त्रीय अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पता उतना नहीं चलता, जितना कई अन्य अवान्तर प्रसगों पर बल देने की प्रवृत्ति का, उदाहरणार्थ, अपनी इस धारणा को प्रमाणित करने की उनकी बलवती प्रेरणा कि तुलसी का जन्म-स्थान सोरों ही था। कुछ भी हो, अपनी सारी न्यूनताओं के साथ उन्होंने, तुलसी की भाषा के कलापक्ष तथा भाषावैज्ञानिक पक्ष के कतिपय प्रचलित एवं व्यापक अगों के आधार पर तुलसी द्वारा व्यवहृत मुहावरों, कहावतों और अलंकारों आदि का स्फुट संकलन करते हुए, तथा कुछ प्रान्तीय भाषाओं और कुछ हिन्दी प्रदेश की बोलियों के कतिपय शब्द-रूपों को ढूँढ निकालने का उद्योग करते हुए, जो सामग्री हमारे समक्ष रखी है, उसका प्रस्तुत अध्ययन में उपयोग किया गया है। वस्तुतः उनके प्रयत्न में यदि सब से अधिक खटकने वाली बात कोई है तो वह यह है कि उनकी दृष्टि प्रायः अन्तरंग विश्लेषण में न पहुँच कर बहिरंग आधार पर ही विशेष केन्द्रित रही। यही कारण है कि विविध रूपों के सकलन में वे अपने परिश्रम द्वारा जितनी सफलता प्राप्त कर सके है उतनी उन संकलित रूपों कीशास्त्रीय व्याख्या एवं मूल्यांकन करने में नहीं । कहीवहीं तो उनके निर्णय और निष्कर्ष बड़े ही हल्के स्तर पर उत्तर आए है। इन्ही बातों के फलस्वरूप उनकी मान्यताओं में अपेक्षित गांभीर्य का अभाव रहा और उनका श्रम उपयोगी होते हुए भी विशेष विश्वसनीय नहीं सिद्ध हो सका । 

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मानस-व्याकरण- मानस सघ, रामवन (सतना) से प्रकाशित यह ग्रंथ हिन्दी में रामचरितमानस की भाषा के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष-व्याकरण-के अध्ययन का ( १०) पहला प्रयास है। इस दृष्टि से, विषय तत्व की समानता के आधार पर, हम इसे एडविन ग्रीन्स के 'रामायणीय व्याकरण (नोट्स थान दि ग्रॅमर श्राफ रामायण ग्राफ तुलसीदास) के जोड़ में रख सकते हैं। ग्रंथ की उक्त ऐतिहासिक उपयोगिता के विषय में कोई अविश्वास न करते हुए भी, उसमें उपलब्ध सामग्री और उसमें अपनाए गए दृष्टिकोण की वैज्ञानिक उपादेयता सदेह से खाली नहीं कही जा सकती। यह घोषित कर के, कि 'तुलसी ने भाषा शब्द से 'प्राकृत भाषा' का अर्थ ग्रहण किया है, त्रिपाठी जीकदाचित सत्य से बहुत दूर चले गए हैं। वे स्पष्ट लिखते हैं :- "यह ग्रंथ अथ से इति तक प्राकृत भाषा में है और श्लोक भी पृथ्वीराजरायसो के श्लोकों की भाँति प्राकृत में है, क्योंकि प्राकृत नियमों से नियमित है और प्राकृतव्याकरण के अनुसार शुद्ध हैं  

शनिवार, 5 जुलाई 2025

कीर्ति बिटिया माँ बनी


 कीर्ति बिटिया माँ बनी, हरी भरी हुई गोद। 

परिजन हैं उल्लास में, सबके मन में मोद।। 


आशा दसमी शुभ तिथि, सुदी का स्वाति नक्षत्र। 

 दो हज्जार  बायसी, का सम्बत पावस सत्र।। 


नाती आयुष्मान भव , रहे ख़ुशी आह्लाद । 

सबकी है शुभकामना सबका आशीर्वाद।।  


बुधवार, 2 जुलाई 2025

 



कवि सम्मेलन

 ग्राम पंचायत बड़गांव में 29 जून को शाम 7.30 बजे से राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया है । उल्लेखनीय है कि दिन में वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी संतोष कुमार द्विवेदी जो लोकनाथ के उपनाम से कविताएं लिखते हैं के कविता संग्रह "खुरदुरे पत्थर" का विमोचन  सामुदायिक भवन उमरिया में होगा, उसके बाद उनके जन्मस्थान बड़गांव में राष्ट्रीय कवि सम्मेलन आयोजित है जिसमें देश भर से कवि, गीतकार, ग़ज़लकार शामिल होंगे । 

            ग्राम पंचायत बड़गांव के संयोजन में हो रहा मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह आयोजन लब्धप्रतिष्ठ कवि,  आलोचक प्रो. दिनेश कुशवाह अध्यक्ष- हिंदी विभाग, अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा, की अध्यक्षता और सुविख्यात कवि श्री अष्टभुजा शुक्ल के मुख्य आतिथ्य में संपन्न होगा ।

                  आयोजन का शुभारंभ ख्यात लोक गायक नरेंद्र बहादुर सिंह, अरविंद पटेल और आरती मालवी के बघेली लोक गायन से होगा । 


कवि सम्मेलन में शामिल होंगे राष्ट्रीय ख्याति के कवि 

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कवि सम्मेलन में राष्ट्रीय ख्याति के कवि रचनापाठ करेंगे । जिसमें मुख्य हैं यश मालवीय ( इलाहाबाद), केशव तिवारी (बांदा), वेद प्रकाश शर्मा ( गाजियाबाद), श्री अभय तिवारी (जबलपुर), विनोद पदरज (राजस्थान), इंदु श्रीवास्तव (जबलपुर) शरद जायसवाल हास्य कवि (कटनी), हेमराज हंस और रावेंद्र शुक्ल बघेली कवि प्रमुख हैं ।

KAVI SAMMELAN UMARIA 29.6.2525 BADAGAON



 

बुधवार, 18 जून 2025

कीर्तिमान निश दिन बढ़े, गढ़ें नये सोपान।

कीर्तिमान निश  दिन बढ़े, गढ़ें नये सोपान। 

जन्म दिन की शुभकमना, आये नया बिहान।। 

आये   नया   बिहान   शारदा   के प्रिय लालन ।

मैहर का हो आपके  कर  कमलों    संचालन।।

माँ  शारद से  विनय है ,  आप  हों दीप्तिमान। 

मैहर  के  प्रिय  लाल , बढ़े   यश    कीर्तिमान।।

हेमराज हंस 

 

बुधवार, 7 मई 2025

,अपरेसन सिन्दूर

 

बोल बघेली बोल 

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जब भारत कीन्हिस सुरु,अपरेसन सिन्दूर। 

ता अतंक के बाप का, पाप भा चकनाचूर।। 

सिन्दूरी  आँधी  चली, छोड़िस  अइसा  छाप। 

कुछ जन मुँह ओरमा लिहिन, जना मरा हो बाप।। 

हेमराज हंस 

बम बम बम बम बब्बा बोला अरारा रे। 

रकत  बूंद  का धब्बा  बोला अरारा रे ।। 

भारत के सिन्दूर कै सक्ती देख रही दुनिया पूरी 

आतंकिन  का  अब्बा  बोला  अरारा रे।। 

 हेमराज हंस 

रविवार, 27 अप्रैल 2025

TITIRA KAVI SAMMELAN


 

मइहर कवि दरबार के, रामनरेश


 सम्माननीय कविवर  श्री युत रामनरेश तिवारी जी को जन्म दिन की हार्दिक बधाई शुभकामनायें ,शतायु हों स्वस्थ्य रहें मंगलकामना 
************२७ अप्रैल  *******************
हम पंचे हींठय सिख्यन, पकड़े जिनखर लीख।   
मइहर कवि दरबार के, रामनरेश   प्रतीक।।   

जब बानी औ शब्द मिल,. होंय तपिस्या लीन।
तब कवि राम नरेस अस, मनई बनै शालीन।।

शारद के बरदान अस , हैं नरेश श्री मान । 
जिनखे  हाथे  मा पहुँच, सम्मानित सम्मान। 

पयसुन्नी  अस सब्द का, जे पूजय  दिनरात। 
कबिता उनखे निता ही, जीबन कै जरजात।।   

गीत ग़ज़ल कै आरती ,  दोहा कविता छंद।
आंखर आंखर आचमन, अंतस का आनंद।।

शब्द  ब्रह्म  का  रुप है,  वर्ण  धरै जब भेष।
मइहर  मा  एक  संत  हैं, पंडित रामनरेश।।

तुलसी चउरा अस लगै , सब्दन का लालित्य। 
मैहर मा  चमकत रहैं,  राम नरेश आदित्य।। 
हेमराज हंस 

शनिवार, 19 अप्रैल 2025

सिसकि रहा बंगाल


 बोल बघेली बोल 

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कखरी म लड़िका लये, मारत रही गोहार ।

टुकुर टुकुर देखत रही,  दूरी से सरकार  । ।


आँसू पीरा का लये, सिसकि रहा बंगाल।
ममताहीन ममता भयीं, बेलगाम चंडाल।।

धूं धूं  कइके घर बरा, फूंक दिहिन सब  गाँव । 

हमला  काही  कहि  रहें, उइ  दंगा  सहनाव।। 

हेमराज हंस  

सोमवार, 14 अप्रैल 2025

हमरे देस मा बन चुके

बोल बघेली बोल 

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हमरे देस मा बन चुके, खासे निर्मल गाँव। 

लोटिआ  लै बाहर  चलीं, बहू बराये पांव।। 

हेमराज हंस  

सोसन किहिन गरीब का

 सोसन किहिन गरीब का,  पी गें  पसीना रक्त। 
उंइ बहुरुपिया बनि  रहें,  भीमराव  के  भक्त।। 
 

रविवार, 13 अप्रैल 2025

बंगाल मा ! हा हा कार मचा है

मदारी  रोबा  थें    बांदर    रोबा थें। 
परिबार बिलखत है बिरादर रोबा थें।। 
बंगाल  मा !  हा  हा  कार मचा   है 
उइ  356   धरे  आँधर   सोबा थें। । 
हेमराज हंस  

मंगलवार, 8 अप्रैल 2025

जउन बोया वा काटा भाई।

बघेली कविता 
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जउन   बोया  वा  काटा  भाई। 
अब   काहे    का   घाटा  भाई।।

जर्जर   पोथी   ही  चरित्त कै 
वमै   चढ़ा   ल्या  गाता भाई।।

भया  सुखे  दुःख ठाढ़ न कबहूं  
तब    काहे   का   नाता  भाई। ।

बड़े    सत्तबादी    बक्ता    हा
पुन  थूंका   पुन  चाटा   भाई।।

आजु हबै मुँह जउकी का जउका   
काल्ह  कटी  पुन  लाटा भाई। । 

काहु  का परथन कहूं समर्थन 
आपन  मतलब    सांटा  भाई।।

ऐसी   कूलर  अपना  का  सुभ 
"हँस"   के   है  फर्राटा    भाई।  ।
हेमराज हंस  --मैहर  

सोमवार, 31 मार्च 2025

हमीं बधाई खुब दिहन






 हमीं बधाई खुब दिहन, बसकट केर अपार। 

अपना केर अभार है, सादर   राम   जोहार।।  

पटल के कबि  बिद्वान का, जथा जोग परनाम। 

राम  ब्रम्ह अच्छर  करैं,  दुनिया मा  जस नाम। । 

हेमराज हंस 

रविवार, 30 मार्च 2025

चल रही गाड़ी राम भरोसे।

 चल रही गाड़ी राम भरोसे। 
ढ़ड़क रही  ही ढोसे  ढोसे। । 

उइ  भाईचारा कै बात करा थें  
चक्कू  लये  औ  कट्टा खोसे। । 

तुहूँ  खूब  फरगाय  लिहा 
पसगइयत  थर्रा थै ओसे।। 

पहँसुल मा  काटा थें  सुपारी  
सनकी मारै सरउंता मोसे। 

गुरुवार, 20 मार्च 2025

रोटी हमी करउंटा फेरय नहीं दिहिस।

 बघेली कबिता 
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रोटी  हमी करउंटा  फेरय नहीं दिहिस। 
हेराय गा है जउन वा हेरय  नहीं दिहिस।। 

देखाबटी  प्रभाव  औ  बनाबटी   सुभाव 
आतिमा का हमरे लथेरय नहीं दिहिस। । 

उइ  ठाढ़ रहीं  हमरे कइ  पीठ कइके पै 
सरसुती  लछमी  का  टेरय नहीं दिहिस। । 

अउन पउन करत जेखर अउरी बीत ही 
मन हमार ओइसा  ततेरय  नहीं दिहिस। । 

भले   नहीं  अघान   पेट   हंस   का   कबौ 
पै इदँरामन के साथ  संतरा पेरय नहीं दिहिस।  । 
हेमराज हंस 

मंगलवार, 18 मार्च 2025

बघेली दोहे संग्रह ----386 हेमराज हंस

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हे जग जननी सारदे, मै मांगों कर जोर।
भारत मा सुख संच कै,पबन बहै चहुओर।।

माता जू किरपा किहिन बइठीं आके कंठ।            
तब कविता गामैं लगा हेमराज अस लंठ।।2

श्री गनेस बाधा हरैं    जय जय उमा महेश।
सिउ जी के परिवार,  अस  सुखी  रहय य देस।।3
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 गनपति  जू  हैं  देस मा, रास्ट  बाद  के मान। 
साक्षी  है  पूना  अबै , अउर तिलककै आन। ।4
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भरिन तिलक जी भक्ति मा, देस भक्ति का रंग। 
जग  मा  न  हेरे  मिली ,  या  इतिहास   प्रसंग। ।।5
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रिद्धि सिद्धि सुभ लाभ लै ,आबा हे गनराज। 
अपना का स्वागत करै ,भारत केर समाज। ।6
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धन्न  राष्ट्र  के  रीत  का , धन्न है भारत देस। 
देस भक्ति के रूप मा ,हाजिर स्वयं गनेस। ।7
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 राम कबिन  का  शब्द हैं ,राम संत का ब्रम्ह। 
हुलकी काही आग हें ,औ प्रहलाद का खंभ। । 8
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नबा साल मा सब जने, रहैं निरोग प्रसंन्न।
सब काही रोजी मिलय, खेतन मा हो अन्न।।9

राम देस कै आतिमा, राम देस के प्रान ।
हमरे भारत देस कै, राम से ही पहिचान ।।10

अबधपुरी मा पूर भा, मंदिर का निरमान।
सदिअन के बलिदान का, अबै मिला है मान।।11

केत्तेव पुरखा गुजरिगें लये हिदय मा हूक।
आजु तृप्त भै आतिमा लउलितिया कै भूख।।12

जय जय पाबन अबध कै जय जय भारत बर्ष।13
मंदिर के निरमान का जन जन मा है हर्ष।।

आदि पुरुस जहाँ मनू भें, करिन सृष्टि निरमान।
अजोध्या पाबन धाम है , मनुज का मूल अस्थान।।14

किहिस सनातन सब दिना, जन मंगल का गान।
प्राणी मा सद भावना, बिस्व केर कल्यान।।15

 केत्तव पुरखा  गुजरिगें, मन  मा  लये रहस्स।  
बरिस पांच सै मा मिला ,देखैं का शुभ द्रस्स।। 16
 
अपने  भुंइ  मा  राम जू , मना  रहे  हें पर्ब ।
सत्य सनातन धर्म का, आज हिदय मा गर्ब।। 17
 
आँखिन से देख्यन हमूं ,पहिल नमै तिथि जोग।
खूब  सराही   भाग का , हम  भारत  के  लोग। । 18

कुछ जन मुंह ओरमा लइन, देख के अबध उराव।
जे   भारत    के  पर्ब से,    राखंय     कपट   दुराव।। 19

हमहूं साक्षी बन गयन, समय लइस जब मोड़। 
पूरी  दुनिया  का  दिहिस, श्री राघव  से  जोड़।। 20 

राम देस कै आतिमा, राम देस के प्रान ।
अपने भारत देस कै, रामै से पहिचान ।।21

जब परछन भै अबध कै, ता उइ रहें रिसान। 
अब सत्ता  का स्वाद है,  खट्टा करू कसान।। 22
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कृष्णपक्ष भादव दुइज का दिन सुभ भा बाह।
 जब  पूंछी  इतिहास     ता  देई  वहै   गवाह।। 23
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सदिअन के बलिदान का आजु मिला तै मान। 
अबधपुरी मा सुरू भा मंदिर का निरमान।। 24

अपने रीत रिबाज से ओही आबै बास। 
ज्याखर गुरुद्वारा हबै चीनी दूताबास।। 25
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अब भादों के चउथ का होय दुइज से ईस। 
वा कलंक ढोउत फिरै या सुभ सुदिन रहीस।। 26
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पुन स्थापित अबध मा राम सहित सब अंस। 
पूरी दुनिया कइ रही जय जय भारत बंस।। 27
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भले करोना काल है, पै संबत सुभ नीक। 
पूर पांच सै बरिस मा अबध कै भै तस्दीक।।  28

जे जनता  के  भाबना, केर  करी  तउहीन। 
ता फुर माना राम दै, रही  न कउनव दीन।।29

 हम आपन पूजा करी औ उइ पढ़ै नमाज। 
ईश्वर कै आराधना अलग अलग अंदाज।। 30
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राम देस के प्रान औ, राम बिश्व के गर्व। 
राम ऋचा ऋगवेद कै  साम यजुर्व अथर्व। । 31
********    ****************
राघव मरजादा दिहिन, औ माधव जी कर्म।
दुइ लीखन मा चलि रहा,सत्य सनातन धर्म।।  32
***************************
रिमझिम बदरी कइ रही भींजै नगरी गाँव। 
मानो भादव कइ रहा कान्हा जनम उराव।। 33
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महादेव  हैं बिश्व मा, समता बादी ईश।
चाहे पूजैं  राम जू ,या  पूजै दशशीश। ।  34
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बेल पत्र गंगा जली चाउर चंदन रास। 
शंकर जी पूजैं लगा भारत का बिस्वास ।। 35
****************8*******************
कासी पुनि के सजी ही,दुइ सौ सालन बाद। 
गुंजै डमरू  शंख  औ,  हर हर  भोले  नाद। । 36
--------   -----------------
 किहिस  सनातन सब दिना, जन मंगल का गान। 
प्राणी  मा  सद भावना,   बिस्व   केर    कल्यान।।37
****************************
भिन्न भिन्न भाखा हईं ,अलग अलग है भेस।      
एक  सनातन मा  गुहा , पूरा  भारत  देस।। 38
**************************
देस भक्ति औ धरम कै, मूल भाबना एक। 
उत्तर कै गंगा करै ,दाख्खिन का अभिषेक। ।39
****************12*********************
तीर्थ  हमारे  देश में,  हैं  संस्कृति  के  अक्ष।
वसुधैव कुटुम्बं भावना , जिनका पावन लक्ष।। 40
****************13**************
चह कामिल बुल्के रहैं या रहिमन रसखान। 
सब कै मासियानी लिखिस भारत का गन गान। ।   41
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उनही सौ सौ नमन जे कीन्हिन जीबन हूम। 
बंदे मातरं बोल के गें फाँसी मा झूम।। 42
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जिनखे माथे पूर भा आजादी का जग्ग। 
हम भारत बासी हयन उनखर रिनी कृतग्ग।। 43
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गाँव नगर पूजन भजन दुर्गा जी का बास। 
कहूं राम लीला शुरू कहूं कृष्ण कै रास। । 44
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 जहां बिराजीं सारदा धन्न मइहर कै भूम।   
भक्तन का तांता लगा नाचत गाबत झूम।। 45
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जहाँ बिराजीं शारदा धन्न  मइहर का भाग। 
बंदूखै तक बन गईं नल तरङ्ग का राग।।   46
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पाबन मइहर धाम है  सिद्ध  शारदा पीठ। 
कोउ बाहन से जा रहा कोउ  आबै हीट। । 47
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 गाँव -गाँव मा जबा देबारे पंडा दे थें हूम। 
लोक धरम कै चैत मा चारिव कईतीधूम। । 48
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आठैं   अठमाइन   चढ़ै  खेर  खूंट  का   भोग। 
जलसा का कलसा धरे ''राम जनम का जोग ''। ।  49
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बाना खप्पड़ कालका जबा देवारे हांक। 
बिन प्रचार के चल रही लोक धर्म कै धाक।1 50
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गाँव गाँव   बोबा   जबा  पंडा  दे  थें  हूम।
लोक धरम कै देस  मा चारिव कइती धूम।। 51
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नारी सूचक गालियां दिन भर देते साठ। 
वे भी सादर कर रहे दुर्गा जी का पाठ।। 52
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इंदिरा सुषमा  चावला, औ मेधा अस तेज। 
हे ईशुर मोरे देस मा, पुन  पुन उनही भेज।। 53
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या लोपा  मुद्रा  गारगी , मैत्रेयी  का  देस। 
जहां नारि कै ताड़ना, अत्याचार कलेस। । 54

बिटिआ बेदन कै  ऋचा साच्छात इस्लोक।
दुइ कुल का पामन करइ अउ साथै मा  कोंख।।55

दादू के सुख संच मा जे मानय आनंद। 
अम्मा अस कउनौ नहीं दुनिआ का संबंध।। 56

अम्मा अपने आप मा सबसे पाबन ग्रंथ। 
माता से बढि के नही कउनौ ज्ञानी पंथ।। 57
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पण्डा बइठ देवार मा बजै नगरिया झांझ। 
हांक परी ओच्छा मोरी गूँजे नौ दिन साँझ।। 58

जबा देबारे बोबरि गा होय हूम अस्थान। 
संझा से लै रात तक मढ़ई भगत कै तान।। 59

 नारी के सम्मान से,सम्बत कै सुरुआत। 
दुनिआ का संदेस है, भारत का नवरात। । 60

श्री राघव जू खुद कहिन, तमिलनाडु मा साफ। 
जे अइ उनखे  सरन मा, सगले अइगुन  माफ।।  61

कागा से कोयल कहिस,  दिहा काहे खुरखुन्द। 
तोहरव  प्रिय बोली लगी,  बन जा काग भुसुंड।।62
 
जब  मतलब  पूछय  लगें, रामराज्ज का मित्र। 
हम निकार के धइ दिहन,अबधपुरी का चित्र।।63

*पर्यावरण  के दोहा ************
 परयाबरनी प्रेम कै देखी भारतीय खोज। 
अमरा के छहियां करी अपना पंचे भोज।। 64
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पीपर  मा  बसदेव  जू  बधी  बरा के सूत। 
तुलसी  जू  कै  आरती  आमा मानैं पूत।। 65
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नीम बिराजैं सीतला औ जल बरुन का बास। 
परयाबरन  मा  पुस्ट  है  भारत का बिस्वास।।66
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हमरे  भारत  का  रहै  चह  कउनौ  तेउहार।
सब दिन हम पूजत रह्यन बिरबा नदी पहार। ।67
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फुन्नी ता चिकनान ही लगा है जर मा रोग।
भारत अउर बसंत का या कइसा संजोग। । 68

अपना हयन गुलाब अस, हम कनेर के फूल। 
कोउ दिहिस मछेह के,  छतना  काही  गूल। । 69

 अस कागद के फूल मा, गमकैं लाग बसंत।
जस पियरी पहिरे छलय, पंचबटी का संत।।70

हबा  बसंती  चूम गै,  जब  गुलाब  के ओंठ। 
ता भमरा का झार भै, जिव का रहा कचोट।।71

जब फागुन दसकत किहिस,गड़ी गाँव  मा डाँड़।
चिनी केर रंग बदलिगा ,   लागै  जइसा    खांड।। 72

जिधना से फागुन लगा, बागै मन बउरात ।
दिन गउरइंया अस लगै, औ जिंदबा कस रात।।73

भमरा तक सूंघय लगा अब चम्पा का फूल।
अइसा मउसम मा भला कासे होय न भूल।।74

पुष्पवाटिकै मा मिली, सहज प्रीत का नेम।
सुरपंखा हेरत फिरय, पंचबटी मा प्रेम।।75


फगुनहटी बइहर चली ,गंध थथोलत फूल।
भमरा पुन पुन खुइ करै, तितली पीठे गूल।।76


सनकिन सनकी बात भै, आगू पाछू देख।
कब आंसू मा भींज गै लखिस न काजर रेख ।।77

 बड़ी   ललत्ती   लग  रही,  अमराई   कै  भूंख। 
असमव ओखे डाल मा, नहीं कोयलिया कूंक।।78

महुआ अस महकैं लगा, जब मन मा मधुमास।
ता आँखिन के नेत का, भा खंडित संन्यास।।79
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बीस जघा करजा किहिन, ता होइ सका प्रबंध।
अपना का आबा नहीं, नेउता मा आनंद।।80

बिन  गोनरी गगरी धरे रही प्यास का साध। 
तोहरे निता श्रृंगार रस ओखे जिव का ब्याध। । 81

काहू का घंटा बजै औ काहू का ढोल। 
पै किसान के खेत से होइगै यूरिया गोल।। 82

हमरे भारत देस मा कबिता बड़ी लोलार। 
छत्रसाल राजा बने कबिता केर कहार।।83
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मन माही माहुर भरे मुंह मिसरी अस मीठ। 
अपना के बेउहार का लगै कहूं न डीठ।। 84
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हमरे देस मा होइ चुके अइसा निर्मल गाँव। 
लोटिआ लै बाहर चलीं बहू बराये पांव।। 85
-----------------------------
गाँव गाँव आमै लगा जबसे य अख़बार। 
मिर्रा तक जानैं लगा सब आपन अधिकार। । 86
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बड़े जबर संगठन हें जात बाद के हेत। 
तउ बिटिया के बाप का बिकिगा सगला खेत। । 87
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 पता नही कउने जघा को कर दे इंसल्ट 
घर से निकरा पहिर के बिन कालर कै सल्ट। । 88
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 बड़ा भयानक लगि रहा लोकतंत्र का चित्र। 
गंधइलन  के कान मा खोंसा फूहा इत्र  । । 89
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जेखे पीठे म बजा बारां का घरियार। 
ओहिन की दारी सुरिज कढ़ई खूब अबिआर। 90
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 पेटहा जब मुखिया बना लुक लुक के खुब खाय। 
अस्पताल   हिंठै  लगा  तउ न  मन पछताय। । 91
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 राखी  टठिया मा धरे बहिनी तकै  दुआर। 
रक्षा बंधन के दिना  उई पहुंचे ससुरार।।92
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खजुलइयां लइके मिला, हमरे गांव का नेम। 
द्यखतै जिव हरिआय गा,  परिपाटी का प्रेम।। 93
                     
सनकिन सनकी बात भै आगू पाछू देख। 
आँसू माही भीज गय  तब काजर कै रेख ।।94
                
हाथे मा मेंहदी रची लगा महाउर  पाँव। 
सावन मा गामै लगा कजरी सगला गांव।।95
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 पाथर  परिगा   फसल मा   अब  भा मरे बिहान। 
हाय !!दइव !या का किहा कहि के गिरा किसान। ।96
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करहा  आमा  नीझरि  गा  ठूठ  ठाढ़  मउहार। 
चौपट होइ गै फसल सब अइसा मारिस वार। ।   97
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टप टप अँसुआ बहि रहें खेतिहर परा सिकिस्त। 
खाद बीज का ऋण चढ़ा औ टेक्टर कै क़िस्त। । 98
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आरव मिला चुनाव का जागा जनगण देव। 
राजनीत ख्यालैं लगी मेर मेर फउरेब। । 99
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कहूं कहूं बूड़ा चढा भरे खेत औ ताल। 
हमरे बिंध मा चल रही बदरी कै हरताल।। 100
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न सामन कै हरिअरी न नदिअन मा धार। 
बइठ किसनमा मेंड़ मा गदिआ धरे कपार।। 101

चीता   आबा   देस  मा   सीगट   भा     नाराज।                   
 कहिस कि अब कइसा बनब जंगल का महराज। । 102
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  सीगट कै ही चाहना रहै जंगली शान।     
बन का राजा जब रहै सीगट लोखरी श्वान। ।103
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जंगल मा साहुत बनी ,सीगट लोखरी केर। 
देख  देख  बिदुरा  थै ,बन  का  राजा शेर।।  104
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दहसत माही कलम ही, कागद करै रिपोट। 
राजनीत कब तक करी, गुंडन केर सपोट।। 105

गाहिंज करै गरीब कै करय दीन का ख्याल। 
'अन्त्योदय' के मंत्र हें पंडित दीनदयाल। । 106
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जे   कबहूँ  खाइन  नही,  रोटी  भाई  साथ।
देस मा उइ बांटत फिरैं  जगन्नाथ का भात। ।107
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 बेउहर के भीती  लिखा ''अति गरीब परिवार ''।  
   पानी पानी होइ रही बाँच बाँच सरकार।108
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 खड़ी जलाका जेठ कै औ भै बिजली गोल। 
कूलर से बिजना कहिस जान्या हमरिव मोल। । 109

मघा नखत बदरी करय धरती का खुशहाल।
महतारी  के  हाथ  कै  जइसा  परसी  थाल।।  110
        
ऊपर दउअय रुठि गा औ नीचे दरबार।
धरती पुत्र किसान कै को अब सुनै गोहर। । 111
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 धन्ना  सेठन  के  निता  गर्मी बरखा जाड़।
हमही एक मउसम हबै रोटी केर जुगाड़। । 112
    
कउड़ा के नियरे संघर अपना सेकी देह।
हम धांधर के आग का लिखी उरेह उरेह।। 113
   
फसलन मा पाला लगा परी ठंड कै मार।
भितरघात मउसम करै खेत कहै आभार।। 114
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 नेता   जी  के  नाव  से  उभरै  चित्र  सुभाष।
अब के नेता लगि रहें जइसा नहा मा  फांस।। 115
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 चुटकी भर के ज्ञान का झउआ भर परमान।
तउअव अपने आप का हंस कहै बिद्वान।।  116

अस छरकाहिल मनई भा निठमोहिल  बेउहार।
अब  ता  कारिव  के  परे  हिरकै  नहीं   दुआर।।  117
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पूरी दुनिया कइ रही जउने रंझ बिलाप। 
कारन लुच्चा चाइना गुड़ का कोल्हू बाप।। 118
         
बिस्व मा हाहाकार है धरी मउत कै सीन ।
वाखर जुम्मेदार है घिनहा घाती चीन।। 119
        
दुस्ट चाइना बिस्व मा छोड़िस अइसा गाज। 
त्राहि त्राहि जनता करै किलपै सकल समाज।120
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नीच चीन के पाप का, देस रहा है भोग। 
रजधानी से गाँव तक बगरा छुतिहा रोग।। 121

कहां बची केसे बची, लुकी कहां ठे ओंट।
पेट धंधा से लगि रहा, हमी करोना छोटे।। 122

ठाँव ठाँव करी परी बढ़े करोना केस । 
भारत माता बिकल ही बांच सोक संदेस। ।123
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मिली  करोना  कै  दबा,  बरियत्तन  हे राम। 
अब ता चीन के पाप का, होई काम तमाम।। 124
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परी  करोना  रोग  कै,  दुनिया  भर  मा हाक।
मुँह मा मुसका बांध के, दुइ गज रखी फराक।। 125
*********************************      
शुभ सदेश मिलते नहीं कहीं किसी भी ठौर। 
हे ! प्रभु कब तक चलेगा श्रद्धांजलि का दौर। । 126
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बढ़ा करोना का कहर सावधान प्रिय मीत। 
मुंह ढकें दूरी रखें होगी अपनी जीत। । 127
******************************      
देख रहा है देस या उनहूँ कै करतूत। 
माओ बदिन के निता जे हैं साहुल सूत। । 128
*****************************      
बहुत सहि चुका देस या नक्सल अत्याचार। 
अब ता ओखे रीढ़ मा हरबी कारी प्रहार। ।129
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 कहां धरोगे ऎसे धन को जिसमें लगी हो आह। 
स्वयं ढूढ़ता वह चलने को घर में बारह राह।  130
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 सूरज नेता विश्व का सबका पालनहार। 
मानसून हित तिप रहा करने को उपकार। । 131

हमरे लोक के तंत्र का,देखा त अंधेर।
साहब आगू भींज बिलारी,चपरासी का शेर॥132

गददारी उंइ करथें, खांय देस का नून।
लोकतंत्र के देह मां,भ्रस्‍टाचार का खून॥133
      
गदियन मां मेहदी रची,लगा महाउर पांव।
सावन मां गामय लगा,कजरी सगला गांव॥134

अस कागद के फूल मां,गमकैं लाग बसंत।
जस पियरी पहिरे छलै,पंचवटी का संत।135
      
जुगनू जब खेलिस जुआं,लगी जोधइया दांव।
पुनमांसी पकडै.लगी,अधियारे के पांव ॥136

घ्वान्घा मा तइती बधी मुदरी नव ग्रह केर। 
बागै  पीर मजार तउ लिहिस सनीचर गेर।। 137
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बेमतलब के बहस मा दहकैं ठोंकैं ताल। 
महगाई मा मीडिआ पूँछै नहीं सबाल। ।  138
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महगाई जब जब किहिस जनता का हलकान। 
हष्ट पुष्ट सरकार तक लइ लीन्हिन बइठान।  । 139
*******************************
चुटकी भर के ग्यान का, झउआ भर परमान।
तउअव अपने  आप,  का  हंस  कहै  बिद्वान।।140
*****************************
भारत माता ही बिकल,सुन के दुःख सन्देश। 
सेना पति का खोय के, शोकाकुल है देस।।141
****************************** 
टूटी फूटी सड़क मा, टोल बरिअ र  शुल्क। 
जय हो नेता आप कै, सिसकै बपुरा मुल्क। ।142
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अपना कहि के चल दिहन, टी बी मा दुइ टूक। 
कोउ  भरा  उराव  मा,  उचै  काहु  के  हूक । ।143
******************************* 
मॅहगी जबक चीज भै, महग तेल पिटरोल।
तउ रजधानी मउन ही, कढ़ै न एकव बोल। । 144
****************************** 
जनता काही बजट या, लागा थै या मेर।
जइसा क़्वामर पान मा, ब्याड़ै लउग चरेर। । 145
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सम्पाती  के  दंभ कै,  द्याखा   ऊंच   उड़ान। 
जो जटायु अस उड़त ता, करत देस गुनगान। ।146

दियना  कहिस  अगस्त  से,  दादा  राम जोहार। 
तुम पी लिहा समुद्र का, हम पी ल्याब अधिआर। । 147
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दस दुष्कर्मिन का टिकस, हत्तियार का बीस। 
लोक तंत्र के सदन के, उचै हिदय मा टीस। । 148
*****************************
केतू  घिनही  लग  रही,  राजनीत  कै चाल। 
टुकुर टुकुर जनता लखै, दइके नाक रुमाल। । 149

हे ! पुरुषोत्तम राम जू  ,हती  दशानन  मार। 
ताकी कुछ हलुकाय अब, भू मइया का भार। । 150
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गाँधी वाद है बिस्व मा एक बिचार अजोर। 
जिनखे बल आई हिआ, आजादी कै भोर। । 151
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जिआ सौ बरिस पार तक, जननायक परधान। 
भारत के खातिर हयन, अपना शुभ बरदान। । 152
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जेखे आपन बिछुरिगें, सुधि म भीजै आँख। 
उनही है श्रद्धांजली, के दिन पीतर पाख।। 153
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पुरखन के सम्मान का, पितर पाख है सार। 
जे हमका जीबन दयिन,उनखे प्रति आभार। । 154
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राष्ट्र गान के हिदय मा, है ज्याखर अस्थान। 
पुनि के चाही प्रान्त  वा, आपन विंध्य महान। ।    155
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बिन इस्नु बिन पाउडर, फागुन गमकै गंध। 
द्यांह धरे  बगै  जना ,  रीत  काल  का छंद।।156
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अस कागद के फूल मा, महकैं लाग बसंत। 
जस पियरी पहिरे छलय , पंचबटी का संत।।157
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फगुनहटी बइहर चली ,गंध थथ्वालत फूल। 
भमरा पुन पुन खुइ करै, तितली पीठे गूल। । 158
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मन मेहदी अस जब रचा, आँखिन काजर कोर। 
सामर  सामर  हाथ  मा, जइसन  गदिया   गोर। ।    159   
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असमव उनखे बाग, मा नहीं कोयलिया कूंक। 
मन मसोस रहि जाय औ, उचय हदय मा हूक। ।160
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सड़क छाप हम आदमी, उइ दरबारी लोग। 
हम ता बिदुर के साग अस अपना छप्पन भोग। । 161
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भेद भाव बाली रही , ज्याखर क्रिया कलाप। 
हर चुनाव के बाद वा, बइठे करी बिलाप। । 162
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नेतन काही फ्री मिलै , ता लागै खूब उराव। 
जनता के दारी उन्ही , लागै मिरची घाव। । 163
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चह जेही थुर देंय उइ ,याकी कहैं कुलांच। 
नेता जी के नाव से, अयी न कऊनव आंच। ।164
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सुनिस घोसना कापि गा, थर थर बपुरा पेण्ट। 
खीसा  का  बीमा  करी , जेब  कतरा  एजेण्ट।।  165
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सरबर मा चाकी परै, जब देखा तब जाम। 
ओखे बिन सब अरझ गें , बड़े जरुरी काम। । 166
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धन्न  बिन्ध्य  कै भूमि या, धन्न हें बाबूलाल। 
गदगद माटी होइ रही , गांव गली चौपाल।। 167
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भूखों  की ए  बस्तियाँ  , औ  फूलों के जश्न। 
ओ माली तेरी नियत पर ,क्यों न उठेंगे प्रश्न। । 168
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जंगल बिरबा कटरिगे ,मिली कहा अब मित्र। 
फेसबुक मा द्याखत रही , निल कण्ठ के चित्र। ।169
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नील  कंठ  औ शमी  मा  ,देखा  गा   देवत्व। 
दसराहा का शुभ हबै ,दरसन करब  महत्त्व। । 170
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अपने छाती  हाथ  धर ,  खुदै  करा    महसूस। 
अइसन कउन किसान है, जे नहि दीन्हिस घूस। । 171
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जिधना से भृगु जी हनिंन , श्री हरि जू का लात। 
लछमी जी रिसिआय के चली गयीं  गुजरात।।  172
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बहुत बड़े धर्मात्मा बड्डे धन्ना सेठ। 
पै ओखर नोकर रहैं बपुरे भूखे पेट।। 173
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जे कबहूँ खाइस नही रोटी भाइन साथ। 
ओखे हाथे मा हबै जगन्नाथ का भात। । 174
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कबहूँ कुरुआ  मा नपयन ,कबहूँ नपयन कुरई। 
बासमती  उनखे  निता,   हमरे   निता   कोदई। । 175
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हाँ  हजूर  हमहूं  हयन , फाँसी  के  हकदार। 
हमसे  कहबररै  नहीं ,  रिक्शा  काहीं  कार। । 176

नेता  जी  के  नाव  से , उभरै  चित्र   सुभाष। 
अब के नेता लागि रहें, जइसा नहा मा फास।। 177
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गांव गांव मदिरा बिकै , दबा शहर के पार। 
कउने सब्दन मा करी अपना का आभार। । 178
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दारू  बंद  बिहार  मा, लागू कड़क अदेस।
भर धांधर जो पिअय खय ,आबा मध्यप्रदेश।।
आबा मध्य प्रदेश ,हिया ता खुली ही हउली।   
पानी कै  ही  त्रास  खुली मदिरा कै बउली। ।
पी  के  चह  जेतू  मता ,कउनव नहीं कलेस। 
कबहूँ  पाबन्दी  नहीं  अपने   मध्य प्रदेश। ।179
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बड़े अदब से बोलिए, उनखर जयजयकार। 
गाँव गाँव  मा चल रही गुंडन कै  सरकार ।। 180
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मुलुर मुलुर जनता लखै , बन के बाउर मूक। 
साइत ज्यतबव जाय उड़ , अउर जोर से फूंक। । 181
 
हा हजूर हम गॉव के शुद्ध देहाती ठेठ। 
अपना अस काटी  नहीं हम गरीब का पेट। । 182

भारत के मरजाद कै जेहि न एकव ग्यान। 
तउ चाहा थी ''हेलना'',   बेटा  बनै  महान। । 183

चह कामिल बुल्के रहैं या रहिमन रसखान। 
सब कै मासियानी लिखिस भारत का गन गान। । 184

नीचन  मा  सत्सङ्ग  का ,  एकव   नहीं प्रभाव। 
जस घिनहाई मा रमै , कुकूर सुमर सुभाव।।  185
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राजनीत औ मीडिआ ,दुनहु का दिल फ्यूज। 
इनही  चाही बोट औ ,उनही ब्रेकिंग न्यूज़। ।  186
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अंतस मा पीरा करै, अपनेन का बेउहार। 
लंका जीते राम जू , औ गें अबध मा हार। ।  187
*****************************
चोरन का चोट्टा दिखय ,औ शाहन का शाह। 
पै झरहन  कै रात दिन ,सुलगै छाती डाह। ।  188

आसव  के सामन  मा  सजनी , भा  येतू बदलाव। 
तुम लगत्या हा खजुराहो अस ,औ हम देवतलाव।।  189
************************
धनहन  मा  दर्रा  परा ,पाबस मरै पिआस। 
दम्भी बादर कइ रहें , सामान का उपहास।।  190
**********************
ऊपर दउअय रुठि गा ,औ नीचे दरबार। 
धरती पुत्र किसान कै , को अब सुनै गोहर।। 191
*********************
रुपया किलो अनाज मा ,जबसे जांगर टूट। 
दिन भर ख्यालै तास उइ ,साँझ पिअयं दुइ घूंट। । 192
**************************
दिल्ली ललकारै लगी ,सुन रे बीजिंग नीच। 
जो तै ब्रातासुर  हये , ता  हम  बज्र  दधीच। । 193
*************************
हर  हर  महादेव  से , गूंज  उचा गलबान। 
ललकारिस जब इंडिया , चीनी पेल परान। । 194
**************************
दगा बाज ओ चाइना ,तोही दई तिलाक। 
अब भारत के हद्द मा , चली न एकव धाक। ।195
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बांसठ का भउसा नहीं , सुन ले जाहिल चीन। 
अब  भारत  समरथ हबै ,  घुस  के  लेइ बीन। ।  196
*************************
कोउ हिंदू मुस्लिम करै ,कोऊ आर्य अनार। 
दोउ जन का चलि रहा ,है घिनहा ब्यापार। । 197
*************************
किहिन मजुरै देस का ,सबसे ज्यादा काम। 
तउअव जस मानै नहीं ,मालिक नामक हराम।। 198
**************************
धोखा दीन्हिस इंडिया ,भरी बिपत के ठाँव। 
तब  आंसू  पीरा लये , भारत  पहुंचा   गांव। ।  199
************************
हमरे हियाँ गरीब कै, सब दिन आँखी भींज। 
धन्ना  से ठ कै आत्मा ,  कबहूँ  नहीं  पसीझ। । 200
*******************************
रोटी से बढ़ के हिबै ,जेखे नित अमलास। 
वा कइसा अनुभव  करी ,पीरा आंसू त्रास।। 201
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हमरे हियाँ मनइन  कै ,गजब निराली शान। 
पेटे  मा  दाना  नहीं ,  मुँह  मा  दाबे   पान। ।   202
*******************
भाई  चारा  प्रेम  का , चला  लगाई  रंग। 
तबहिन अपने देस मा बाजी झांझ मृदंग। । 203
***************************
जनता से बढ़ के नहीं ,लोकतंत्र मा  धाक। 
रय्यात से गर्रान जे , बागा रगड़त नाक।। 204
***********************
क्यत्ता बड़ा बिचित्र है ,देस भक्त दरबार। 
जे हाँ मा हाँ  न कही ,वा घोसित गद्दार। । 205
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दीपदान  कै लालसा , तीरथ का अनुराग।
चित्रकोट कोउ जा रहा कोऊ चला प्रयाग। । 206
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धरमराज  कै फड़ सजी ,  चलै जुआं का खेल। 
गाँव  गाँव  मा  झउडि गय , शकुनी बाली बेल। । 207
*************************
राबन के भय से लुका , जब से बइठ कुबेर। 
तब से धनी गरीब कै अलग अलग ही खेर। । 208
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उल्लू   का  खीसा  भरा ,  छूंछ हंस कै जेब। 
या भोपाल कै चाल  की, दिल्ली का फउरेब। । 209
********************
जब सागर का मथा गा ,कढ़े रतन दस चार।
ओहिन मा धन्वन्तरी , मिलें हमी उपहार। । 210
****************************
दुनिआ भर कै औषधी , रोग बिथा संताप। 
धनबन्तरि का सब कहै , आयुर्बेद का बाप। ।211
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तिली मूंग उर्दा सरा , भा यतरन  झरियार। 
बरा मुगउरा के निता , परी कहाँ से दार। ।212
*************************
भारत कै पहिचान हें ,राम बुद्ध औ कृष्न। 
इन माही स्वीकार नहि ,कउनव  चेपक प्रश्न।। 213
*****************************
हिन्दी डाक्दरी पढ़ रही,गदगद मध्यप्रदेस।
पै अंगरेजी  से  लड़ै , हाई कोट  मा  केस।।214
**********************
उइ ठेगरी लगबा रहें मार मार के ख्वाँग। 
औ जनता बिदुराथी देखि देखि के स्वाँग। । 215
************************
ख़बरदार होइ के मिल्या बहुत न मान्या सूध। 
वा गुलदस्ता मा धरे है गोली बम बारूद।। 216
*********236****************
 जेही सब मानत रहें जादा निकहा सूध।
ओखे डब्बा म मिला सबसे  पनछर  दूध।।217
*************************
 गदिअय खजुलइया धरे, कजरी गाबै पर्व। 
अपने  तिथ  तिउहार  का, गाँव समेटे गर्व। । 218
*************
 साहब सलाम औ पैलगी, गूंजै राम जोहर। 
अबहूँ अपने  गाँव मा,  बचा  हबै   बेउहार। । 219
*************************
 भाई चारा प्रेम का खजुलइयां तिउहार। 
बढ़ै अपनपौ देश मा मेल-जोल बेउहार। । 220
********************
 छुरा घोंपते पेट में चढबाते परसाद। 
जैसे लेखनी पूजता हो कोई जल्लाद। । 221
*********************
धर फूलों के बीच में जिसने ठोकी फ़ांस। 
हमने देखा आँख से उसका होते नाश। ।222
************************
 त्राहिमाम जनता करय गुंडा हाकै राज। 
मुड़धारियन के कण्ठ से निकरै नही अबाज। । 223
*******************
बने हितैषी घूमते रचते नाना ढोंग। 
शोषण करते जाति का स्वयं जाति के लोग। । 224
*************************
 जिसने कभी विकास पर दिया तनिक न ध्यान। 
जाति   वाद   उनके  लिए  सत्ता का सोपान। ।225
*****\****************
 'हंस ' योग्यता का सदा रहा सुखद परिणाम। 
अफजल को फाँसी मिली राष्ट्राध्यक्ष कलाम। । 226
*******\*********************
भले अभावों से सदा रहे जूझते जंग। 
पर जीवन के चित्र में हो ईमान का रंग। । 227
******\********************
 उनखर हिबै समाज मा सबसे लम्बी पूछ। 
जे बैभव से भरे हें संवेदना से छूछ। । 228
********\*********************
लेखनी जब करने लगी कागद लहू लुहान। 
 ब्रह्म शब्द तक रो पड़ा धरा रह गया ज्ञान। । 229
****************************
 बपुरा सुविधा संच का तरसै हिंया मजूर। 
अपना का आँसै नही वा भर मुंह कहै हजूर। । 230
************************
 सत्ता अउर साहित्त कै बस येतू बिरदन्त। 
उनखे कई 'जयन्त ' औ हमरे ठई ''दुष्यंत "। । 231
*****************************
  दशा देखिये श्रमिक की या उसका उन्माद। 
पीड़ा   में   मावाद   है  मुंह में जिन्दावाद। । 232
**************************
 है प्रत्यक्ष प्रमाण सी , श्रम की  साधक आह। 
खड़ा हुआ ये ताज है, वो हो गये तवाह। । 233
******\***********************
 ऐसा जीवन दीजिये हे राम तुम्हें सौगन्ध। 
मेरे रिश्तों से कभी आये न दुर्गन्ध। । 234
***\******************
घातक भ्रष्टाचार से यहाँ मिलावट खोर।
करते है ये देश का तन मन धन कमजोर। ।235
******पंडित दीनदयाल  **********
गाहिंज करै गरीब कै, करै दीन का ख्याल। 
अंत्योदय के मंत्र हें,   पंडित   दीन  दयाल।।   236
***************
जब भारत माही मची, सामाजिक दहचाल। 
मानववाद लइ आय गें, पंडित दीन दयाल।। 237
***********************
अपने  तीरथ बरथ मा, राष्ट्र वाद का प्रेम। 
'एकात्म' के ग्रंथ मा, सबका  हित औ क्षेम।। 238
************************
बसै  देस कै  आतिमा, टोला गाँव देहात। 
पंडित जी के  सूत्र  हें,  जगन्नाथ अस भात।। 239
***********************
राष्ट्र वाद के कलश अस,  एकात्म के मूल। 
पंडित जी शतशत नमन, करै बघेली फूल।।240
*************************** 
 चाहे ये सत्ता रहे या कि और  विधान। 
पंडित दीनदयाल का बिखरे न अभियान। । 241
**********************************
 आंसू क्रंदन का यहां मत कीजै व्यापार। 
अन्य दिशा में मोड़िये राजनीति की धार। । 242
**************************
 सदा गरीबों ने लड़ा लोकधर्म का युद्ध। 
पर कुलीन की कोख से आये सब दिन बुद्ध। । 243
**************************
 पूंजी पति की देखिये सूझ बूझ तरकीब। 
हरे लाल के रंग में बंटता रहा गरीब। । 244
********************
 वैचारिक सी वामियां सिद्धांतों के पाप । 
जनमेजय को डस रहे नाप नाप कर सांप । । 245
***************************
हाथे मा मेंहदी रची ,कर स्वारा सिगार। 
गउरी पूजैं का चली ,सजी सनातन नार। । 246
******************
भले  छह्याला   मा रहा  ,सत्त  सनातन  बीज। 
आपन सत छाड़िस नहीं ,परिपाटी अस चीज। । 247

जनता के हाथे हबय लोकतंत्र का मान। 
चला चली सब जन करी सौ प्रतिशत मतदान।। 248
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चुनकी  मा चुकरी धरे ,भरे  सतनजा  भूंज। 
 दाऊ कै मइया चली , अगना हरछठ पूज।। 249
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छुला जरिया कांस औ ,पसही महुआ फूल।  
हरछठ प्रकृति अभार कै ,हिबै भाबना मूल। । 250

जिधना जमुना जी किहिन, यम के तिलक लिलार। 
भाई  बहिन  के  प्रेम  कै ,  बन  गय  दुइज   लोलर। । 251
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हयी  हमारे  देस  मा ,  बहिनी  बिटिआ  पूज। 
भाई  बहिन  के  प्रेम  का  ,पाबन  भाई  दूज। । 252
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ईसुर  से  बिनती  करी , यहै  लालसा   मोर। 
अपना का जीबन रहै , जगमग  सदा अजोर। । 253
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 विवेका नंद जी 
पूज   विवेकानंद  मा  है  भारत  का  गर्व।
उनखे बसकट मा रमा जुवा दिवस का पर्व।।254
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रचिन  विवेकानंद  जी एक  नबा इतिहास।
भारत  केर  महानता  का   बगरा  परकास।।255
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जुरे  शिकागो  मा रहें  दुनिया  के  बिद्वान।
एक सुर मा ब्वालैं लगें जय जय हिन्दुस्तान।।256
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चाह    शंकराचार   हों   चाह   विवेका नंद।
भारत के जसगान का रचिन ऋचा औ छंद।।257
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भारत माता के रतन लाड़िल अटल लोलार। 
जन जन के हिरदय बसें दीन्हिस देस दुलार।।258
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अटल बिहारी देस के उज्जर एक चरित्र। 
उनखे अस को देस मा भला बताबा मित्र।। 259
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भारत के नेतन निता अटल एक इसकूल। 
देस देय श्रद्धांजली सादर आंखर फूल।। 260

पन्नी बीनत बीत गै ज्याखर उमिर किसोर। 
ओखे दुअरै कब अइ बाल दिबस कै भोर।। 261

जे कबहूं जानिस नही पोथी अउर सलेंट। 
बूटन मा पालिस किहिस होटल घसिस पलेट।। 262

हिंआ ब्यबस्था खाय गै पंजीरी औ खीर। 
गभुआरन के भाग मा बदी कुपोसित पीर।। 263

दरबारी जेही कहै बोटहाई मा नात। 
पै कबहूं देखिन नही वाखर दुधिया दांत।। 264

हबैकुपोसित देस मा जेखर ल्यादा घींच। 
ओ! बालदिबस फुरसत मिलै ता उनहूं का सींच।। 265
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जातिहाई का जानिगें उइ अटकर अंदाज। 
सुदिन देख ह्यराय चलें जब बिटिया का काज। । 
जब बिटिया का काज जबर है दइजा  नाहर। 
सुन दहेज़ का भाव थूंक न निकरै बाहर। । 
बिन दइजा  के बड़ मंशी का को अपनाई। 
हंस कहिन बस वोट के खातिर ही जातिहाई।।266

चांदी  कै चम्मच करै , पतरी केर दुलार। 
या बरबस्ती देख के , दोनिआ परी उलार।।  267
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बड़ा अमारक जाड़ है ठठुरा है परधान। 
उइं बिदुराती हईं कह 'दुइ रूई 'का उपखान।।268
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बने  हितैषी  घूमते , रचते  नाना  ढोंग। 
शोषण करते जाति का स्वयं जाति के लोग। ।269
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 उनखर हिबै समाज मा सबसे लम्बी पूछ। 
जे बैभव से भरे हें संवेदना से छूछ। । 270
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नफरत   कै खेती  करैं ,मन  के  रोगी लोग। 
 हे धनबंतर  जी करा ,उनखर हिदय निरोग।।  271
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देस मा  भ्रस्टाचार का, ह्वाथै यतर निदान।
जइसा जींस पहिर के काटै फसल किसान।।272
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ओतुन परबस्ती करा , जेतू कूबत पास।
परोपकार मा चला गा ,भोले का कैलास।। 273
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रहिमन पनही राखिये ,बिन पनही सब सून। 
दिल्ली से देहात तक ,पनही का कानून।।  274
********  **********
श्री राघव जू आ रहें बीते चउदह साल। 
या  उराव मा जलि रहे घर घर दीप मशाल।।275
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येतू  दीन्हिस  देस  का,  आभारी  है  हिंद । 
तउअव  रोजी के निता , तरसै बपुरा बिंध । । 276
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पहिले  प्रेम  प्रसंग  का ,खूब  भा  लोकाचार।
 फेर ओही लुच्ची  कहिस ,वा ओहि दहिजार।। 277
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बिद्या का मंदिर दिहिन उंइ निकहा के लीप।
कोऊ  लइगा  जंगला,  कोऊ  सरिआ चीप।।278
******************************* 
वा  कुपंथ कै देख ल्या केतू कुटिल हिआव। 
आर्य द्रबिन मा  भेद कइ ,बाँट रहें हें गॉव।। 279

देखा  केतू  गहिर  है  लोकतंत्र  का कुण्ड।
राजकुमार जयंत तक बनगे कागभुसुण्ड।।280

बब्बा जी कीन्हिन रहा खसरा केर अपील।
नाती तक पेसी चली बिदुराथी तहसील।।  281
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 भारत के इतिहास मा आबा अइसा बक्त। 
महबूबा तक बन गयीं महादेव कै भक्त।।  282

हाथे मा मेंहदी रची , कर स्वारा सिगार।
गउरी पूजैं का चली ,सजी सनातन नार। ।283

खूब फलिहाइस रात भर, दिन निर्जला उपास। 
देखा  भारतीय  प्रेम के ,  अंतस  केर मिठास ।। 284

जबसे उंइ डेहरी चढ़ीं ,  छूट हिबय सरफूंद ।  
हमरे  जीबन के  दिहिन , सगले अबगुन मूंद।।    285
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कहिस कुलांचै धरम  का, दिहिस आतिमा रोय।
जइसा  कउनव  बाप कै, बिटिआ भागी होय।। 286
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जउनै दल हेन न करी, धरम कै जय जयकार।
बामपंथ  अस  होइ  जई,  वाखर   बंटाधार।। 287
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राजनीत कै नीचता, देखि के जुग चउआन।
गांधी  बादी  देंह  मा,   बाम   पंथ  के  प्रान।।288
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तानासाही सोच का लोकतंत्र न रास।
पेटे मा अकरास ही मुंह माही उपहास।।289
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बंदेमातरम जब कहिन, हमरे देस के पूत। 
सुन बइरी थर्राय गा , हेराय   लाग  भभूत ।।  290
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दुनिआ माही को करी, हमरे देस कै सउज। 
हर हर महादेव जब, ब्वालै आपन फउज।।  291
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मोदी  हमरे  देस के, स्वाभिमान  परतीक। 
भुट्टो कै अउकात ही, जइसा पान कै पीक।।  292
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भारत  कै ही  कामना, अपनव  बनी नजीर। 
जइसा माता इंदिरा, दिहिन "पाक" का चीर।।   293
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न सामन कै हरिअरी न नदिअन मा धार।
बइठ किसनमा मेंड़ मा गदिआ धरे कपार।।294
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बड़ा  अमारक जाड़  है,  ठठुराबय    दहिजार। 
साजन से सजनी   कहिस, लगत्या आजु पिआर। । 295
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जाड़े का ओरहन दइस,भींज वास कै रात। 
ता संज्ञा का छोड़ के, सुरिज कढ़ा बिदुरात।। 296
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राजनीत  औ  धरम   का, जुगन जुगन से साथ।
अजुअव हें  उइ साथ मा,  भला कउन नई बात।। 297
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नबा साल मा सब जने, रहैं निरोग प्रसंन्न।
सब काही रोजी मिलय, खेतन मा हो अन्न।।298
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बड़ी बड़ाई का लगै अपना का जो मोह।
ता कुछ जन का जोर के लेई बनै गिरोह।।299
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कूकुर का कूकूर लगै,  दिखय  सिंह  का शेर। 
यातो ओछाहिल सोच ही,याकि नजर का फेर।। 300
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सत्य अहिंसा प्रेम का गाँधी एक बिचार।
गाँधी दरसन मा हबै जीवन का सुख सार।।301

लिहे किसनमा ठाढ़ है, खेते कै फ़रियाद।
बिजली घाई गोल ही, मोरे बीज कै खाद।।302

संत सताबत देख के,लगी हिदय मा ठेस।
केतू नामक हराम है, जालिम बांग्ला देस।।303

जेखर उपरउझा लिहिस, जूझा भारत देस।
वहय सनातन का बना, सबसे बड़ा कलेस।।304

जे गरीब तक से लिहिन, अपने पुरबी घूंस।
देशभक्ति के सभा मा, ओखर जबर जलूस।।305

जे  कबहूं  घोरिस नहीं, पानी माही हींग।
भा निनार ता जम गयीं, ओखे मूड़े सींग।।306

 नल  कुबेर  के हिदय  मा, काहे उचय  न  टीस। 
वा एक तो बड़मंसी  लिहिस, औ मागै बकसीस।। 307

भला बताई आप से, कउन ही आपन सउंज।
अपना बोतल का पियी, हम पी पानी अउंज।।308

छोहगइली लये चांदनी, जागी सगली रात। 
नदी तीर गोठत  रहा, चन्दा रोहणी साथ  । । 309

जब से पोखरी ताल का, होइगा पानी थीर। 
ता चकबा निरखैं  लगा, चंदा  कै  तसबीर।।  310

प्रेम भरी पोखरी रही, कोउ दिहिस घघोय। 
जस बिजली के तार का, जम्फर टूटा होय।। 311

पहिले लड़ीं गिलास खुब, नेम प्रेम सम भाव। 
फेर गारी गुझुआ  भयीं, होय  लाग जुतहाव।। 312

बांध फूट पुलिया बही गिरी कहूं स्कूल।
दरबारी कहि रहें हें यमै दइव कै भूल।। 313

संकट मा भारत दइस, सरना गत का टेक। 
चाह दलाईलामा  हों, याकि   हसीना  सेख।। 1314

हमरे भारत मा हबै, मउसम केर बिभाग।  
होय  देबारी देस मा, ता वा बताबय फाग।। 315

लिपटिस पीपर से कहिस, है उपयोग हमार। 
पै  भारत मा  हर  जघा,  पूजा  होय   तुम्हार।। 316

पीपर बोला  सुन सखा,  हम  भारत   के बीज।
हम हन मंदिर अस हिया, औ तुम जस टाकीज।। 317

राघव के  दरसन   निता, आँखी  रहीं   बेचैन। 
जब मंदिर के पट खुलें, छलक परे दोउ नैन।।318

जुग जलसा भा अबध  मा, उइ लीन्हिन मुँह फेर ।
तबय  कुसाइत  आय गै,  लिहिस   सनीचर  गेर।।319

भले लगा लें जोर सब, उनही दई तिलाक। 
करके चूर घमंड का, टोरिहै राम पिनाक।। 320

सुनतै जेखे नाव का, जांय मुगलिया कांप।
भारत  के  वा  बीर हैं,  महराणा  परताप।।321

भ्रस्टाचार मा डूब गा, जब मगधी दरबार।
धनानन्द  सैलून मा,  लगें  बनामय   बार।।322

कहिन फलाने हम हयन, पढ़े लिखे भर पूर।
पै अब तक आई नहीं, बोलय केर सहूर।।323

भारत पूजिस सब दिना,रिसी कृसी के साथ।
एक हाथे मा शास्त्र का, शस्त्र का दूजे हाथ।।324

चिलचिलात या घाम मा, मिली कहूं न छाह।
चिटका फोरत चली गय, एक पिआसी डाह।।325

 तुम रहत्या जब साथ ता , पता चलय न बाट। 
औ रस्ता छोह्गर लगै, मानो मोहनिया घाट।। 326

लेत  रहें  जे थान  के,  लम्बाई  कै नाप।
अर्ज देख लोटय लगा,उनखे छाती सांप।।327

भला बताई आप से, कउन ही आपन सउंज।
अपना बोतल का पियी, हम पी पानी अउंज।।328

 न मात्रा  का  ज्ञान  है, न हम  जानी वर्ण। 
पारस के छुइ दये से, लोहा होइगा स्वर्ण।। 329

जेखे  मूड़े मा रहय,  अपना का आशीष  ।
वा बन जाय कनेर से , गमकत सुमन शिरीष।  । 330

चाहे  कोऊ  कवि  लिखय,  चह  शायर  श्रीमान। 
सब्द सक्ति जब तक नहीं, तब तक नही  प्रमान।।  331

राजमार्ग   मा  चल  रहें ,  बड़े  बेढंगे   यान। 
चालक काही है नहीं, अपर डिपर का ज्ञान।। 

जे आँख मिलाइस सुरिज से भा अपंग वा गिद्ध। ।332
जो जटायु अस रहत ता जग मा होत प्रसिद्ध।।

एक गंधाइला जेल का एक अतर कन्नउज। 
भ्रष्टाचार से कइ रहें  शिष्टाचार कै सउंज।।  333

सब दिन लड़ें गरीब हेन लोक धरम का जुद्ध।
पइ  महलन के कोंख से आये सब दिन बुद्ध।।334

भारत के पहिचान हें राम बुद्ध औ कृष्न।
इन माही स्वीकार नहि कउनौं क्षेपक प्रश्न।।335

पूंछ रही ही दलन से, लोक सभा कै ईंट। 
केतने  दुष्कर्मी  निता, है आरक्षित सींट।।336

केबल  हबै  चुनाव तक, जातिबाद का ढोंग। 
जनता ही उनखे निता , चेचर अउर चिपोंग।।337  

अपने   छाती   हाथ  धर,  खुदै   करा  महसूस। 
को ठीहा मा बइठ के, लिहिस न जात से  घूंस।। 338

सूरज नेता बिस्व का, सबका दे उजिआर।
पै उल्लू  गरिआ रहें, उनही  रात  पिआर।।  339

सगले   उल्लू   समिट  के,  दिन   का  कहैं  कुलांच।
कहिन कि अब हमहूं  करब, सुरिज के रथ कै जाँच।। 340 

राहू  से   केतू   कहिन,  हम  पंचे   सब      एक। 
चला चली मिल के कारी, खुद आपन अभिषेक।। 341

अबै ता  चीन्हय दूर  से, जाति बाद का जिंद। 
फेर चुनाव के बाद मा , उनखे  मोतियाबिंद।। 342

गदगद होइगै आतिमा ,देख अबध पुर पर्व। 
सगले दानव दुखी हें , मानव का है गर्व। । 343

आदि  पुरुस  जहाँ मनू भें, करिन सृष्टि निरमान।
अजोध्या पाबन धाम है , मनुज का मूल अस्थान।।   344

अबै गरीबन के लगी टप टप अंसुअन धार।
अइसा मा कइसा लिखी पायल कै झंकार।।345

रहा गरीबन से सदा बोटन का बेउहार।
दूबर कै एकादशी मोटन का तेउहार।।346

राष्ट्रबाद  से  सुरू भा ,जाति बाद मा बंद। 
केत्ते सुर बदलय परें, गामय का एक छंद।।347

भारत  का  गउरव बढ़ा,  बढ़ा  तिरंगा मान। 
अभिनंदन दुनिया करै, जय खगोल बिज्ञान।।348

दुनिआ  मा  हो  शान्ती, हे ! माता   स्कंद। 
हे ! दुरगा दुरगति हरा, बाढ़य  प्रेम आनंद।। 349

गुँजय मइहर  धाम मा ,भगत ऋचा श्लोक। 
हरतीं मइया सारदा, भक्त  के संकट सोक। । 350

श्रद्धा औ संगीत का, सपना भा साकार।
नल तरङ्ग संतूर संग, बाजैं लाग सितार।।351

मइहर  घोसित  भा जिला, जनता करै उराव।
पांच सितंबर लिख दइस, स्वर्णाक्षर मा नाव।।352

गदगद मइहर धाम है, पूर भा  मन कै टेक ।
मेघा बरखें  झूम के  दइव करै अभिषेक। ।   353

कालनेमि पुन  देश मा, रचे हें  मायाजाल।
जनता कै   रक्षा  करा,  हे अंजनि के लाल।।354

दुनिया मा सब दिन लड़ें, धरम औ रीत रिबाज। 
शाकाहारी    सुआ    के,   बीच   रहै  न   बाज।।  355

हमी  न   नजरा  तुम  यतर  दरबारी  सरदार । 
दुइ कउड़ी के हयन  पै मन के  मालगुजार। । 356

जबसे वा कनमा भरिस हिरनकच्छ के कान। 
 तबसे प्रेम  प्रहलाद  कै  खतरे  मा  ही  जान। । 357

पहिले प्रेम प्रसंग का ,खूब भा लोकाचार। 
फेर ओही लुच्ची  कहिस ,वा ओहि दहिजार।। 358

भमरा तक सूंघय लगा अब  चम्पा का फूल। 
अइसा मउसम मा भला कासे होय न भूल।।349
 
ठूठन मा फुटकी कली यतरन आबा जोस।
तन कै हालत देखि के मन का रह्यान मसोस ।।350
 
जय जय अमर सहीद कै, आजादी के मूल।
अपना का अर्पित करी,आंखर आंखर फूल।। 351
  
जिनखे  माथे  पूर भा,   आजादी   का   जज्ञ।
हम भारत बासी हयन, उनखर रिनी कृतज्ञ।।352

थइली  ही  उनखे निता, रइली  हमरे नाम।
कइसा हीसा बाँट के, दीन्ह्या हमही राम।।353
 
देस  मा  भ्रस्टाचार  का ,  ह्वाथै  यतर निदान।
जइसा जीन्स पहिर के , काटै फसल किसान। । 354

चह जेखर जलसा रहै, मिलैं गरीबय थोक। 
हर रइली  के बाद मा, आँसू पीरा सोक। । 355
   
खेत बिका कोलिया गहन बिकिगा झुमका टाप।
पट्टीदार    बिदुराथें    सिसकै    बिटिअय   बाप।।356

मानस  माही जे रहें   ,कांदव कीच उलीच।
उइ  मनई लागैं  हमीं, उच्च कोटि के नीच।। 357

बड़ा  अमारक जाड़  है,  ठठुराबय    दहिजार।
साजन से सजनी   कहिस, लगत्या आजु पिआर।358

ओतुन परबस्ती करा , जेतू कूबत पास। 
परोपकार मा चला गा ,भोले का कैलास।। 359
*******************************
आरव मिला चुनाव का, जुरय लाग  सहदेब ।
राजनीत  ख्यालैं   लगी,  मेर   मेर   फउरेब। ।360

हे लछिमी जू आइये , साथै सिरि गनेस। 
मोरे भारत देस मा , दालिद बचै  न शेष।। 361
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-कीर्तिशेष -कवि -लछिमन सिंह परिहार-

किहिन  बघेली  का  सुघर , हस्ट पुस्ट दिढ़बार।  
आंखर आंखर मा अमर ,लछिमन सिंह परिहार। ।362
 
अपने बोली का दिहिन, जिवभर खूब दुलार।
पयसुन्नी  रेबा कहै ,  जय   महराज   कुमार  । । 363
 
समय लिखी इतिहार जब , कबौ  बघेली सूत। 
बांच  बांच  बिंध्या  कही , धन्न  हे ! बानी पूत। ।364

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भारत रतन पटेल
आजादी  के दिआ मा,  भरिन  जे  बाती तेल। 
देस  करै  सत  सत नमन ,भारत रतन पटेल।। 365
                                             
पांच सै बांसठ राज मा, अइसा कसिन लगाम। 
सब उनखे  ललकार से ,लिहिन तिरंगा थाम। ।366
                  
 सिरि  सरदार पटेल कै , सूझ बूझ औ ढंग। 
 देख के साहस बीरता ,दुनिया रहि गय दंग।367
        
गुरिआ गुरिआ गुहि दिहिन ,देस का साहुत सूत। 
जय  बल्लभ  'सरदार'  जी,  भारत   रतन  सपूत। ।368
             
हम भारत बासी करी ,शत शत नमन अभार। 
जब  तक चंदा  सुरिज हें,  नाव चली सरदार।  ।   369
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               शम्भू काकू
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जहां बघेली आय के, होइगै अगम दहार। 
वा रिमही के शम्भू का, नमन है बारम्बार।। 370
             
बघेली  साहित्त के, शम्भू  काकू   सिंध। 
देह धरे गाबत रहा, मानो कबिता बिंध। । 371
             
गांव गली चउपाल तक, जेखर बानी गूंज। 
श्री काकू जी अमर भें, ग्राम गिरा का पूज। । 372
         
लिहे घोटनी  चल परैं, जब कबिता के  संत। 
सब कवि काकू का कहैं, रिमही केर महंत। ।373
         
न चुट्कुल्ला उइ कहिन, ना अभिनय परपंच। 
बड़ा मान आदर दइस,तउ कबिता का मंच। । 374
       
जेखे कबिता के बिषय, आंसू आह कराह।  
अच्छर फरयादी बने,  काकू  खुदै  गबाह। ।375
      
कबिता  का पेसा नहीं,  जेखे  कबहूं  चित्त। 
बिन्ध्य लिलारे मा, लिखे, काकू केर साहित्त। ।   376
    
आंखर आंखर मा बसय,काकू कै कहनूत। 
हंस  बंदना  कइ  रहा, धन्न   बघेली   पूत। । 377
--------------------------------------------
भगवान परशुराम 
शासक जब कीन्हिन बहुत, सोसन अत्याचार। 
तब ईस्वर   का  लें परा, फरस  राम  अबतार।। 378
 
दुस्टन काही काल अस, औ सज्जन का संत ।
भृगु  नंदन श्री राम हैं, स्वाभि मान    श्री मंत ।।379

भारत पूजिस सब दिना,रिसी कृसी के साथ।
एक हाथे मा शास्त्र का, शस्त्र का दूजे हाथ।। 380

जुग नायक ता भे नहीं, कबौं जात  मा कैद। 
उइं  बीमार समाज के, हें सुभ चिंतक बैद।।  381
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देस  मा  केतू  होइ  चुका,   भ्रष्टाचार   निलज्ज। 
अब ता शक माही  हमय , न्यायधीश अउ जज्ज।।  382

जन मानस मा बसे हें परम ब्रह्म श्री राम।
जे उनसे भा बिमुख ता समझा काम तमाम।।383

हिरणाकश्यप जब किहिस, धरम केर उपहास।384
दुष्ट राक्षसन मा लिखा,है वाखर इतिहास।।

पहिले हिरदय मा किहिन, सब्द बान से घाव।385
अब पुटियामै के निता, हेरय लाग हिआव।।
बंदनीय जे जगत मा, चढै रोज जल फूल।
पाबन तुलसी का कहै, रेंणा ऊल जलूल।। 386

धन्न है उनखे ग्यान का, देस करी उल्लेख।
जे  जनता से कहि रहें ,मगरोहन का मेंख ।।

 सोसन किहिन गरीब का,  पी गें  पसीना रक्त। 
उंइ बहुरुपिया बनि  रहें,  भीमराव  के  भक्त।। 
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मेरी पसंद

मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर