मुक्तक
हम फुर कही थे ता कान उनखर बहा थै।
पता नही तन मा धौ कउन रोग रहा थै। ।
तन से हें '' बुद्ध '' मन से बहेलिया
पंछी अस पीरा या लोकतंत्र सहा थै। ।
हेमराज हंस 9575287490
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
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