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शनिवार, 4 अप्रैल 2015

घर बरिगा ता बरिगा हम दमकल ता देख्यन।।

मुक्तक 

पिआसा   परा   हम  हेन  नल  का देख्यन।
ऊसर   मा  बाइत  करत  हल का देख्यन। । 
आगी    लगाय   के   अब  कहा   थें   फलाने 
घर बरिगा ता बरिगा हम दमकल ता देख्यन।।     
                     हेमराज हंस 

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मेरी पसंद

मेरी पसंद  -------------- रात रात भर जाग के  कागद  रगे हजार।  पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार।  महाकवि आचार्य  भगवत दुबे - जबलपुर