बघेली
-----------------------------------------
पूछी अपना बपुरी से कि कइसा जी रही
जेही कोऊ गारी दइस होय बाँझ कै।
बीर पदमधर का या पीढ़ी नहीं जानै
उनही मुखागर हें किस्सा हीर रांझ कै। । ------------
हेमराज हंस
बघेली साहित्य -का संग्रह हास्य व्यंग कविता गीत ग़ज़ल दोहा मुक्तक छंद कुंडलिया
मेरी पसंद -------------- रात रात भर जाग के कागद रगे हजार। पर दोहा हम लिख सके मुश्किल से दो चार। महाकवि आचार्य भगवत दुबे - जबलपुर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें